मौन मुस्कान की मार | Maun Muskaan Ki Maar PDF Download

मैंने और अधिक उत्साह से बोलना शुरू किया, ‘‘भाईसाहब, मैं या मेरे जैसे इस क्षेत्र के पच्चीस-तीस हजार लोग लामचंद से प्रेम करते हैं, उनकी लालबत्ती से नहीं।’’ मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर एक विवशता भरी मुसकराहट आई, वे बहुत धीमे स्वर में बोले, ‘‘प्लेलना (प्रेरणा) की समाप्ति ही प्लतालना (प्रतारणा) है।’’ मैं आश्चर्यचकित था, लामचंद पुनः ‘र’ को ‘ल’ बोलने लगे थे। इस अप्रत्याशित परिवर्तन को देखकर मैं दंग रह गया। वे अब बूढ़े भी दिखने लगे थे। बोले, ‘‘इनसान की इच्छा पूलती (पूर्ति) होना ही स्वल्ग (स्वर्ग) है, औल उसकी इच्छा का पूला (पूरा) न होना नलक (नरक)। स्वल्ग-नल्क मलने (मरने) के बाद नहीं, जीते जी ही मिलता है।’’ मैंने पूछा, ‘‘फिर देशभक्ति क्या है?’’ अरे भैया! जरा सोशल मीडिया पर आएँ, लाइक-डिस्लाइक (like-dislike) ठोकें, समर्थन, विरोध करें, थोड़ा गालीगुप्तार करें, आंदोलन का हिस्सा बनें, अपने राष्ट्रप्रेम का सबूत दें। तब देशभक्त कहलाएँगे। बदलाव कोई ठेले पर बिकनेवाली मूँगफली नहीं है कि अठन्नी दी और उठा लिया; बदलाव के लिए ऐसी-तैसी करनी पड़ती है और की पड़ती है। वरना कोई मतलब नहीं है आपके इस स्मार्ट फोन का। और भाईसाहब, हम आपको बाहर निकलकर मोरचा निकालने के लिए नहीं कह रहे हैं; वहाँ खतरा है, आप पिट भी सकते हैं। यह काम आप घर बैठे ही कर सकते हैं, अभी हम लोगों ने इतनी बड़ी रैली निकाली कि तंत्र की नींव हिल गई, लाखों-लाख लोग थे, हाईकमान को बयान देना पड़ा। मैंने कहा कि यह सब कहाँ हुआ, बोले कि सोशल मीडिया पर इतनी बड़ी ‘थू-थू रैली’ थी कि उनको बदलना पड़ा। प्रसिद्ध सिनेमा अभिनेता आशुतोष राणा के प्रथम व्यंग्य-संग्रह ‘मौन मुस्कान की मार’ के अंश|.
TELEGRAM
4.4/5 Votes: 5,006
Author
Ashutosh Rana
Size
2.4 MB
Pages
97
Language
Hindi

Report this Book

Description

 मौन मुस्कान की मार | Maun Muskaan Ki Maar PDF Download Free in this Post from Google Drive Link and Telegram Link ,

All PDF Books Download Free and Read Online, मौन मुस्कान की मार | Maun Muskaan Ki Maar PDF Download PDF , मौन मुस्कान की मार | Maun Muskaan Ki Maar PDF Download Summary & Review. You can also Download such more Books Free -

Description of मौन मुस्कान की मार | Maun Muskaan Ki Maar PDF Download

Name : मौन मुस्कान की मार | Maun Muskaan Ki Maar PDF Download
Author : Invalid post terms ID.
Size :  2.4 MB
Pages : 97
Category : Satire
Language : Hindi
Download Link:  Working


मैंने और अधिक उत्साह से बोलना शुरू किया, ‘‘भाईसाहब, मैं या मेरे जैसे इस क्षेत्र के पच्चीस-तीस हजार लोग लामचंद से प्रेम करते हैं, उनकी लालबत्ती से नहीं।’’ मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर एक विवशता भरी मुसकराहट आई, वे बहुत धीमे स्वर में बोले, ‘‘प्लेलना (प्रेरणा) की समाप्ति ही प्लतालना (प्रतारणा) है।’’ मैं आश्चर्यचकित था, लामचंद पुनः ‘र’ को ‘ल’ बोलने लगे थे।

 

Summary of book मौन मुस्कान की मार | Maun Muskaan Ki Maar PDF Download

बात उस समय की है, जब न मैं ठीक से बड़ा हुआ था और न ही मेरी गिनती छोटों में आती थी। मैं अपने एक मित्र के साथ अपने कस्बे गाडरवारा में ‘टेढ़ मुहल्ला के घाट’ से उतर रहा था।
गोधूलि वेला का समय था, हम दोनों मित्र अपने कंधों पर बस्ता लटकाए पैदल ही स्कूल से घर की ओर बढ़ रहे थे, ढलान होने के कारण हमारी रफ्तार अपेक्षाकृत अधिक थी कि तभी मेरी दाई तरफ पैदल चलते हुए मेरे मित्र, जो
मुझे स्कूल में पढ़ाई गई ‘चारु चंद्र की चंचल किरणें’ कविता का अर्थ समझा रहे थे, अचानक पीछे से आती हुई एक साइकिल के अगले पहिए में फंसे हुए बहुत तेजी के साथ मुझसे दूर जाते हुए दिखाई दिए। मैं कुछ समझ पाता
इससे पहले ही मेरे मित्र, वह साइकिल और साइकिल सवार तीनों ही सड़क के किनारे ढलान पर लगे आम के पेड़ से जा भिड़े।
यह असोचित और अवांछनीय घटना पलक झपकते ही घटित हो गई थी, मैं बदहवास सा दौड़कर उनके करीब पहुँचा तो देखा कि मेरे मित्र श्री मैथिलीशरण गुप्तजी की कविता को भूलकर उस साइकिल सवार की कॉलर से झूमे हुए स्कूल से बाहर सीखे गए ‘अशिष्ट अनुप्रास’ अलंकारों का चीखते हुए प्रयोग कर रहे थे।

वे दोनों धूल में गुत्थमगुत्था थे, मैं उनको अलग करके सुलझाने की कोशिश करने लगा, किंतु उन उलझे हुओं को सुलझाना उतना ही मुश्किल था, जितना गीले उलझे हुए लंबे बालों को सुलझाना। मेरे मित्र गुस्से से लाल और धूल से पीले पड़े हुए तार सप्तम में ब्रेथलेस की पैटर्न पर चीख रहे थे—’कनवा (काणा) सारे अंधरा (अंधा) कहीं
का जब सायकल चलात नई बने तो चला काय खों रए हो? एक आँख पहलउँ से फूटी है, कनवा कहीं का अपशगुनी, सारे हम दूसरी भी फोड्ड डाल हैं।’
दूसरी तरफ साइकिल सवार भी अपने शरीर की चोट को भूल, स्वयं को कनवा (काना) कहे जाने से बुरी तरह
आहत होकर प्रतिआक्रमण कर रहे थे, ‘सारे तुमाय बाप की आँखें नहीं हैं, हमरी आँख है हम एक आँख से देखें
चाय दोई से तुमाय बाप को का जा रओ।’

We have given below the link of Google Drive to download in मौन मुस्कान की मार | Maun Muskaan Ki Maar PDF Download Free, from where you can easily save PDF in your mobile and computer. You will not have to pay any charge to download it. This book is in good quality PDF so that you won't have any problems reading it. Hope you'll like our effort and you'll definitely share the मौन मुस्कान की मार | Maun Muskaan Ki Maar PDF Download with your family and friends. Also, do comment and tell how did you like this book? 

Q. Who is the author of the book मौन मुस्कान की मार | Maun Muskaan Ki Maar PDF Download?
Answer.

Download

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *