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हिमयुग की वापसी (विज्ञान गल्प) : जयंत विष्णु नार्लीकर

भाग -1

‘‘पा पा, पापा ! जल्दी उठो। देखो, बाहर कितनी सारी बर्फ है! कितना अच्छा लग रहा है!’’ 

राजीव शाह की सुबह-सुबह की गहरी नींद बच्चों के शोरगुल से उचट गई। पहले तो उसे समझ नहीं आया कि शोरगुल किस बात पर हो रहा है। कविता और प्रमोद क्यों इतने उत्तेजित हो रहे थे?

‘‘पापा, क्या हम नीचे जाकर बर्फ में खेल सकते हैं?’’ कविता ने पूछा।

बर्फ! यहाँ मुंबई में! यह कैसे मुमकिन है? राजीव की नींद फौरन गायब हो गई । वह लपककर खिड़की के पास पहुँचा और बाहर झाँका । उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। वाकई! बाहर बर्फबारी हुई थी। दूर-दूर तक घरों के बीच में बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी और तभी उसे महसूस हुआ कि कितनी ठंड पड़ रही थी। बच्चों ने तो दो-दो स्वेटर तक चढ़ा लिये थे। गरम कपड़ों के नाम पर उनके पास वही स्वेटर थे। वैसे भी मुंबई में गरम कपड़ों की जरूरत किसे पड़ती है। ये स्वेटर भी उन्होंने पिछले साल ऊटी में खरीदे थे और तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन मुंबई में उनकी जरूरत पड़ेगी।

‘‘नहीं! नीचे मत जाओ।’’ ठंड से सिहरते हुए राजीव बोला और फिर अपने चारों ओर शॉल लपेटते हुए उसने भी हथियार डाल दिए, ‘‘हम छत पर चलेंगे। लेकिन पहले अपने जूते-मोजे पहन लो।’’

प्रमोद और कविता दौड़कर पहले ही छत पर पहुँच गए। राजीव ने भी एक और मोटा शॉल निकाल लिया। उसकी दिली इच्छा हो रही थी कि उनके पास भी कोई हीटर होता। यहाँ तक कि कोयलेवाली अँगीठी से भी काम चल जाता है।

पिछले एक हफ्ते से जलवायु में जो बदलाव आ रहे थे उसी की परिणति थी यह बर्फ। आमतौर पर तापमान 15 डिग्री सेल्सियस तक गिरने पर ही मुंबईवाले शोर मचाने लगते हैं कि ठंड पड़ रही है। कल दिन का तापमान मुश्किल से 5 डिग्री पहुँचा था और रात में 0 डिग्री हो गया । लेकिन किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि बर्फ भी पड़ने लगेगी। इस बर्फबारी ने मौसम के अच्छे-अच्छे पंडितों के मुँह बंद कर दिए थे। अब मौसम में कहाँ और क्या परिवर्तन आएगा, कोई नहीं जानता।

‘‘जल्दी आओ, पापा!’’ छत की ऊपरी सीढ़ी से प्रमोद चिल्लाया। अपार्टमेंट के सबसे ऊँचे माले पर बने इस फ्लैट के मालिक होने के नाते छत पर भी उन्हीं का अधिकार था। मुंबई जैसे शहर में यह बड़े शान की बात थी।

‘‘मैं आ रहा हूँ। पर अपना ध्यान रखो। बर्फ फिसलन भरी हो सकती है।’’ सीढि़याँ चढ़ते हुए राजीव ने बच्चों को सावधान किया। वह समझ नहीं पा रहा था कि छत पर कितनी ठंड होगी।

लेकिन छत पर पहुँचते ही आस-पास का नजारा देखकर वह अपनी चिंता भूल गया। उसे लगा कि गरम और आर्द्र जलवायु के शहर मुंबई की बजाय वह क्रिसमस कार्ड पर छपे किसी यूरोपीय शहर की तसवीर देख रहा हो। हिंदू कॉलोनी की कुंज गलियों में लगे पेड़ों पर भी सफेद चादर बिछी हुई थी। लेकिन फुटपाथों और सड़कों पर यातायात के कारण काले-सफेद का बेमेल संगम हो रहा था। दादर के पार जाती रेल लाइन भी सुनसान पड़ी थी।

‘‘मैं शर्त लगा सकता हूँ कि मध्य रेलवेवालों ने भी अपना तामझाम समेट लिया होगा। उन्हें किसी बड़े बहाने की जरूरत नहीं पड़ती।’’ राजीव बड़बड़ाया, ‘‘मुझे हैरानी है कि पश्चिम रेलवेवाले क्या कह रहे होंगे।’’ जवाब के तौर पर तभी उसे माहिम की ओर जाती पटरी पर लोकल ट्रेन दिखाई दी।

लेकिन राजीव की कल्पनाएँ पाँच साल पीछे की उड़ान भर रही थीं, जब उसने एक शर्त लगाई थी। उस वक्त तो शर्त लगाना बहुत आसान लग रहा था कि क्या मुंबई में बर्फ पड़ेगी? उसका दावा था, ‘कभी नहीं।’ लेकिन वसंत ने बड़े यकीन के साथ कहा था, ‘अगले दस वर्षों के भीतर मुंबई में बर्फ पड़ेगी।’

लेकिन ऐसा केवल पाँच वर्षों के भीतर ही हो गया।

वाशिंगटन में भारतीय राजदूत द्वारा दी गई दावत में पहली बार वह वसंत से मिला था। वसंत यानी प्रो. वसंत चिटनिस, जो उस दौरान अमरीका में जगह-जगह पर व्याख्यान दे रहे थे। राजदूत ने उस दावत में डी.सी. मैरीलैंड और वर्जीनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों को बुलाया था। कुछ पत्रकार भी थे, जिनमें राजीव भी एक था।

विज्ञान और राजनीति पर गपशप का दौर जारी था। लेकिन वसंत चुपचाप बैठा था। ऐसी दावतों और गपशप में वह शायद ही कभी शामिल होता हो।

‘टेलीप्रिंटर पर अभी-अभी एक संदेश आया है। ज्वालामुखी वेसूवियस दोबारा फट पड़ा है।’ एक पत्रकार लगभग चिल्लाता हुआ अंदर दाखिल हुआ।

‘हे भगवान्! तीन महीनों के भीतर फटनेवाला यह चौथा ज्वालामुखी है। ऐसा लगता है कि धरती माता का पेट खराब हो गया है।’ राजीव ने वसंत से कहा, जो उसकी बगल में ही बैठा था।

‘पर हमें धरती माँ के पेट की बजाय उसकी खाल की परवाह करनी चाहिए।’ वसंत ने तुरंत ही जवाब दिया।

‘आपका क्या मतलब है?’ राजीव ने पूछा।

‘हाँ-हाँ, वसंत! हमें भी बताओ।’ मैरीलैंड विश्वविद्यालय से आए एक प्रोफेसर ने कहा।

‘अच्छा! जब कोई ज्वालामुखी फटता है तो उसका सबकुछ धरती पर ही नहीं गिरता है। कुछ पदार्थ वायुमंडल में भी घुल-मिल जाता है। यह निर्भर करता है कि कितना? क्योंकि एक निश्चित स्तर पार करने पर प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाता है। मुझे डर है कि हम उस सीमा को अगर पार नहीं कर गए हैं तो उसके निकट तो पहुँच ही गए हैं।’ वसंत ने गंभीरतापूर्वक बताया।

‘प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा! फिर उससे क्या होगा?’ किसी सनसनीखेज ‘कथा’ की उम्मीद में एक अमरीकी खबरनवीस पेन और पैड निकालकर तैयार हो गया।

उसकी आँखों में सीधे देखते हुए वसंत ने उलटा सवाल कर दिया, ‘कल्पना करें कि मैं अपनी सलाह दूँ कि आप अपनी राजधानी वाशिंगटन से हटाकर होनोलूलू ले जाएँ।’

‘पर उसकी जरूरत ही क्यों पड़ेगी?’ खबरनवीस ने पूछा।

‘क्योंकि आप खबरनवीसों को पहेलियाँ बुझाना अच्छा नहीं लगता, मैं इसका जवाब भी दूँगा।’ मुसकराते हुए वसंत ने कहा, ‘मामूली हिम युग के आने से आपको न्यूयॉर्क, शिकागो और यहाँ तक कि वाशिंगटन जैसे उत्तरी शहर खाली करने पड़ेंगे।’

इससे पहले कि प्रो.वसंत और कुछ बता पाते, विदेश मंत्रालय से एक खास मेहमान के आने से उनकी बातचीत में व्यवधान पड़ गया। फिर आम बातचीत होने लगी। लेकिन राजीव वसंत को थोड़ा और कुरेदना चाहता था। अतः जैसे ही बातचीत का मौका मिला, उसने सीधे मतलब की बात की।

‘आप अपने सभी दावों को ठोस सबूतों के साथ पेश करने के लिए विख्यात हैं। लेकिन क्या हिम युग के बारे में आपकी भविष्यवाणी कुछ दूर की कौड़ी नहीं लगती? अवश्य ही मैं आपके क्षेत्र का नहीं हूँ, मगर मेरा मानना है कि अगले हजारों साल तक कोई हिम युग नहीं आएगा । बशर्ते कि हमारा पारंपरिक ज्ञान…’

‘गलत साबित न हो !’ पापड़ खाते हुए वसंत ने उसकी बात पूरी करते हुए कहा, ‘मैं साबित कर सकता हूँ कि अगर हमारे वर्तमान पारिस्थितिकी तंत्र में प्रकृति का संतुलन यों ही बिगड़ता गया तो दस साल के भीतर ही यह मुसीबत आ जाएगी। लेकिन मिस्टर शाह, आपको डरने की जरूरत नहीं। मुंबई में आप सुरक्षित हैं। भूमध्य रेखा के दोनों ओर उत्तर-दक्षिण में 20 डिग्री अक्षांश तक की पट्टी को सुरक्षित रहना चाहिए।’

‘अगर मुझे स्कूल में पढ़ी भूगोल की कुछ मोटी-मोटी बातें याद हैं तो मुंबई भी इसी अक्षांश के भीतर करीब 19 डिग्री उत्तर में स्थित है। आपकी पट्टी के सीमांत पर।’

‘तो हम मुंबईवालों को बर्फबारी और अन्य सब चीजों के साथ असली शीत लहर का सामना करना पड़ सकता है। मुझे कहना चाहिए कि हम आसानी से बचे रहेंगे।’ वसंत ने चहकते हुए कहा।

‘मैं यकीन नहीं कर सकता। केवल दस साल के भीतर मुंबई में बर्फ गिरेगी, यह नामुमकिन है। अगर आप एक दमड़ी लगाएँ तो मैं दस डॉलर की शर्त लगा सकता हूँ कि ऐसा कभी नहीं होगा। निश्चित रूप से यह बहुत दुःसाहसपूर्ण शर्त है।’ दस डॉलर का नोट निकालते हुए राजीव ने कहा।

‘मुझे डर है कि हालात मेरे पक्ष में कुछ ज्यादा ही अनुकूल हैं। निश्चित बातों पर मैं शर्त नहीं लगाता हूँ। पत्रकार साहब, आप निश्चित रूप से यह दस डॉलर हार जाएँगे। उसकी बजाय आइए, हम अपने कार्ड बदल लेते हैं। यह रहा मेरा कार्ड। मैं इस पर आज की तारीख लिख देता हूँ। आप भी ऐसा ही करें। अगर दस साल के भीतर मुंबई में बर्फ गिरती है तो आप मेरा कार्ड लौटा देंगे और अपनी हार मान लेंगे। अगर नहीं पड़ी तो मैं अपनी हार मान लूँगा।’

अभी वे कार्डों का लेन-देन कर ही रहे थे कि मेजबान ने आकर घोषणा की, ‘आइए और हमारे खानसामे द्वारा बनाई गई खास मिठाई का आनंद लीजिए।’

एक बड़ा सा आइस केक उसी मेज पर लाया गया जिस पर कुछ देर पहले दावत चल रही थी। केक का नाम पढ़कर राजीव और वसंत दोनों के चेहरों पर मुसकराहट दौड़ गई। केक का नाम था—‘आर्कटिक सरप्राइज’।

‘वास्तविक ‘सरप्राइज’ तो दस साल के भीतर आने वाला है।’ वसंत बुदबुदाया, ‘पर वह उतना खुशनुमा नहीं होगा।’

छत पर बच्चों ने धमा-चौकड़ी मचा रखी थी। कविता द्वारा फेंका गया बर्फ का गोला राजीव को आकर लगा और वह अतीत से तुरंत वर्तमान में आ गया। सचमुच में वह शर्त हार चुका था। अब उसे डाक द्वारा प्रो. चिटनिस का कार्ड वापस भेजना था। वह सीढि़यों से नीचे उतरा।

पर डेस्क से कार्ड निकालते ही उसपर अंकित फोन नंबर से उसे एक बेहतर विचार सूझा। अवश्य ही शर्त के अनुसार उसे कार्ड डाक द्वारा भेजना था। पर फोन द्वारा उनसे सीधे बात क्यों न की जाए। उसने तुरंत ही फोन मिलाया।

‘‘हाँ, चिटनिस?’’ उसने पूछा।

दूसरे छोर पर स्थित व्यक्ति ने उत्तर दिया, ‘‘जी हाँ, वसंत चिटनिस बोल रहा हूँ। क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ प्लीज?’’

‘‘मैं राजीव शाह बोल रहा हूँ, आपको याद होगा।’’

‘‘हमारी शर्त! बिलकुल, मैं आज तुम्हें ही याद कर रहा था। तो तुम हार मानते हो?’’

राजीव की आँखों के सामने दूसरे छोर पर वसंत का मुसकराता चेहरा घूम गया।

‘‘सचमुच, पर क्या आप मुझे साक्षात्कार के लिए आधे घंटे का समय देंगे? मैं आपकी भविष्यवाणी का वैज्ञानिक आधार जानना चाहता हूँ। मैं आपके सिद्धांत को प्रकाशित कराना चाहता हूँ।’’

‘‘बिलकुल पत्रकार के अनुसार; पर अब इसका कोई फायदा नहीं होगा। फिर भी तुम्हारा स्वागत है, बशर्ते कि तुम सुबह ग्यारह बजे तक संस्थान में पहुँच जाओ।’’

राजीव तुरंत मान गया। वह झटपट दाढ़ी बनाने में जुट गया और साथ ही रेडियो भी चालू कर दिया। रेडियो पर विशेष समाचार बुलेटिन आ रहा था—

‘‘समूचा उत्तर भारत जबरदस्त शीत लहर की चपेट में है। पश्चिमी राजस्थान से बंगाल की खाड़ी तक और हिमालय से लेकर सह्याद्रि की पहाडि़यों तक जबरदस्त बर्फ पड़ी है। हताहतों की संख्या का अनुमान लगाना संभव नहीं है। हजारों की संख्या में आप्रवासी पक्षियों के झुंड मृत पाए गए हैं, जिन्हें मौसम में आए इस अचानक बदलाव का जरा भी अंदाजा नहीं था। ज्यादातर फसलें चौपट हो गई हैं। सड़क और रेल संपर्क बुरी तरह बाधित हो गया है। प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया है। बर्फ की आपदा का सामना करने के लिए प्रधानमंत्री ने विशेष कोष की घोषणा की है। सभी से इस कोष में खुलकर दान करने की अपील की गई है।’’

राजीव ने दूसरा स्टेशन लगाया, पर वहाँ भी यही समाचार बुलेटिन आ रहा था।

तभी कविता की उत्साह भरी चीख सुनाई पड़ी, ‘‘पापा, पापा! आओ, टी.वी. देखो। देखो, इस पर सब जगह बर्फ की तसवीरें दिखा रहे हैं।’’

टेलीविजन पर भी विशेष समाचार बुलेटिन आ रहे थे। समूचे उत्तर भारत में गिरी बर्फ के दृश्यों के अलावा उन बुलेटिनों में और कुछ नहीं था। कम-से-कम तकनीकी तो सूचना के प्रवाह को थामने में समर्थ थी। राजीव को रूसी फिल्म ‘डॉ. जिवागो’ में दिखाए गए दृश्य याद आ गए। टेलीविजन पर देश के प्रमुख शहरों के तापमान दिखा रहे थे—श्रीनगर 20 डिग्री, चंडीगढ़ 15 डिग्री, बीकानेर 15 डिग्री, दिल्ली 12 डिग्री, वाराणसी 10 डिग्री, कोलकाता 3 डिग्री।

केवल मुंबई के दक्षिण में पारा 0 डिग्री के मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर रहने में कामयाब हो पाया था। मद्रास 3 डिग्री, बैंगलोर 2 डिग्री, त्रिवेंद्रम 7 डिग्री तापमान के साथ अपेक्षाकृत गरम लग रहे थे। तभी एक न्यूज फ्लैश आया—राष्ट्रपति ने एक आपात बैठक बुलाई जिसमें उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल के सदस्य, तीनों सेनाओं के प्रमुख, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और विपक्षी दलों के नेता शिरकत करेंगे। इस बैठक में फैसला लिया जाएगा कि क्या राष्ट्रीय राजधानी को दिल्ली से मुंबई ले जाया जाए?

‘तुम्हें अपनी राजधानी वाशिंगटन से होनोलूलू ले जानी पड़ सकती है।’ राजीव को पाँच साल पहले वसंत के कहे गए शब्द याद आ गए, जो उन्होंने अमरीकी खबरनवीस से कहे थे। अगर भारत जैसे गरम देश में बर्फ ने इतना कहर बरपा दिया है तो यूरोप और रूस जैसे ठंडे मुल्कों का क्या हाल होगा? वहाँ का हाल जानने के लिए उसने बी.बी.सी. वर्ल्ड चैनल लगाया।

सचमुच चारों ओर भारी तबाही और बरबादी का आलम था। तापमान 20 से 30 डिग्री तक गिर चुका था। चूँकि कनाडा, यूरोप और रूस ठंडे मौसम के अभ्यस्त थे, इसलिए उन्हें इस बदलाव से कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ा जितना कि भारत में, जहाँ भगदड़ मच गई थी।

अचानक ही राजीव को अपनी मुलाकात का खयाल आ गया। घड़ी में सुबह के 9 बजकर 5 मिनट हो रहे थे। सूरज अपनी पूरी क्षमता से चमकने का प्रयास कर रहा था, लेकिन उसकी चमक किसी ग्रह या चाँद से ज्यादा नहीं थी। कविता और प्रमोद मानकर बैठे थे कि उनका स्कूल आज बंद रहेगा, इसलिए वे दोनों आराम से टेलीविजन देख रहे थे। उन्हें इस बात का भी सुकून था कि उनकी माँ अपने मित्र की बेटी के विवाह में शरीक होने के लिए पुणे गई हुई थीं। वरना वह उन्हें काम पर काम बताती रहतीं।

राजीव ने जल्दी-जल्दी नाश्ता किया और गैराज से अपनी कार बाहर निकाली। कार भी ठंडी पड़ चुकी थी और बहुत माथा-पच्ची करने के बाद स्टार्ट हो सकी। सड़क पर निकलने के बाद असली मुसीबत से सामना होने लगा। बर्फ से ढकी सड़क पर कार बार-बार फिसल रही थी। पर चूँकि राजीव विदेशों में ऐसी सड़कों पर कार चला चुका था, इसलिए थोड़ी-बहुत दिक्कत के बाद वह कार पर नियंत्रण रखने में सफल हो गया। लेकिन मुंबई के ज्यादातर ड्राइवरों के साथ ऐसा नहीं था। अंबेडकर रोड पर लावारिस पड़ी या टकराई हुई कारों और बसों को देखकर तो यही लगता था कि मुंबईवालों को बर्फ पर चलने का अभ्यास नहीं है।

‘‘हम हिंदुस्तानी भी खामख्वाह अपने आपको फन्ने खाँ ड्राइवर समझते हैं। भले ही हमें केवल बे्रक और एक्सलरेटर से ज्यादा कुछ और पता न हो।’’ राजीव बड़बड़ाया और अपनी कार को कीचड़ व मलबे के बीच सावधानी से चलाने लगा।

उसे महसूस हुआ कि कोलाबा पहुँचने में उसे आज कुछ ज्यादा वक्त लगेगा, हालाँकि वहाँ पहुँचने में आमतौर पर 40-45 मिनट ही लगते हैं। खैर, उसके पास अभी डेढ़ घंटे का समय था।

‘‘आइए पत्रकार साहब! आप एक घंटा लेट हैं। क्या आपको रास्ते में साक्षात्कार के लिए कोई और शिकार मिल गया था?’’ दफ्तर में घुसते ही वसंत ने उसका स्वागत किया।

‘‘मुझे खेद है प्रो. चिटनिस। अगर इस गड़बड़-झाले के बीच कार चलाने की बजाय मैं पैदल आया होता तो शायद यहाँ जल्दी पहुँच जाता।’’ राजीव आरामकुरसी पर पसर गया। वसंत भी उसके सामने अपने ओहदे के अनुसार रिवॉल्विंग चेयर पर बैठ गया।

‘‘पहले मेरी बधाइयाँ स्वीकार करें प्रोफेसर, उस दिन आपने क्या सटीक भविष्यवाणी की थी! बिलकुल सही निशाना लगा। पर हम पत्रकार और कुछ चाहे न हों, वहमी जरूर होते हैं। कृपया मेरा वहम दूर करें कि आपने ऐसी सटीक भविष्यवाणी की कैसे? और यह क्यों कहा कि अब इसे प्रकाशित करने का कोई फायदा नहीं होगा?’’

‘‘आपको अपने सवालों के जवाब इन कागजात में जरूर मिल जाएँगे।’’ यह कहते हुए वसंत ने एक फाइल राजीव के सामने रख दी।

उस फाइल में अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में छप चुके आलेखों की टाइप की हुई प्रतिलिपियाँ तथा हाथ से लिखे कागजों का पुलिंदा था। पर उस विषय में अनभिज्ञ होने के कारण राजीव उनका सिर-पैर कुछ समझ नहीं पाया, वह केवल उनके शीर्षकों और निचोड़ों को ही नोट कर सका।

‘‘हिम युग की भविष्यवाणी करनेवाला मेरा वैज्ञानिक सिद्धांत प्रकाशित भाग की बजाय अप्रकाशित भाग में ज्यादा मिलेगा।’’ वसंत ने सहज भाव से कहा।

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘झूठी वास्तविकता के कारण, हर चीज की बारीकी से नुक्ता-चीनी करने और निष्पक्षता के झूठे अहसास के कारण, जिस पर हम वैज्ञानिकों को बहुत गुमान है।’’ वसंत के चेहरे पर व्यंग्य और हताशा के भाव तैर रहे थे। आगे बोलने से पहले फिर उसका चेहरा निर्विकार हो गया, ‘‘आम लोग सोचते हैं कि हम वैज्ञानिक प्रकांड विद्वान् होते हैं, जो ईर्ष्या और लालच से परे केवल ज्ञान की खोज में लगे रहते हैं। पर ये सब बकवास है। हम वैज्ञानिक भी आखिर मनुष्य हैं। मानवीय स्वभाव की सभी कमजोरियाँ हमारे भीतर भी होती हैं। अगर वैज्ञानिक व्यवस्था को नई खोजें हजम नहीं होतीं तो उसके पुरोधा लोग इन खोजों को दबाने के लिए सबकुछ करेंगे। मुझे भी अपने सिद्धांतों और भविष्यवाणियों के स्वर को मंदा कर देना पड़ा, ताकि मेरे विचार प्रकाशित हो सकें। और अन्य हाथ से लिखे विचार, जो आप देख रहे हैं, उन्हें प्रकाशन के लिए कुछ ज्यादा ही अव्यावहारिक और फूहड़ माना गया।’’

‘‘मुझे क्षमा करें, प्रो. चिटनिस।’’

‘‘मुझे वसंत कहो।’’ प्रोफेसर ने बीच में ही कहा।

‘‘धन्यवाद, वसंत! लेकिन आप जो कुछ कह रहे हैं, उसमें कॉपरनिकस और गैलीलियो के दिनों से गजब की समानता दिखती है। अगर मुझे ठीक-ठीक याद है तो कॉपरनिकस ने अपनी पुस्तक में जो प्रस्तावना लिखी थी उसे प्रकाशक ने पूरी तरह बदल डाला, ताकि पुस्तक को धार्मिक संस्थानों की तरफ से प्रतिरोध न झेलना पड़े।’’ राजीव ने बातचीत रिकॉर्ड करने के लिए टेप रिकॉर्डर चालू कर दिया था। इस बीच उत्तर देने से पहले वसंत ने अपने विचारों को कुछ व्यवस्थित कर लिया था।

‘‘उन दिनों धार्मिक व्यवस्था थी, जो वैज्ञानिकों को हतोत्साहित करती थी। आज वैज्ञानिक नौकरशाही है, जो हम वैज्ञानिकों के सिर पर बैठी है। वे समझदार लोग ही तय करते हैं कि क्या चीज प्रकाशन योग्य है और क्या नहीं। और यदि (चीज) यह वास्तविक विज्ञान है तो इसे दिन की रोशनी भी नसीब न हो। पाँच सदी पहलेवाली धार्मिक व्यवस्था की जगह ये आज वैज्ञानिक जगत् के धर्माधिकारी बन बैठे हैं। माफ करना, अगर मैं कुछ ज्यादा ही कड़वा बोल गया हूँ तो।’’

‘‘बेशक वसंत, तुम इस पूरी व्यवस्था पर ही टिप्पणी कर रहे हो। व्यवस्था जैसी भी हो, तुम अपने निजी अनुभव के आधार पर इसे कोस रहे हो। लेकिन अगर मुझे इसका पक्ष लेना होता तो मैं यही कहता कि अपने पूरे कैरियर के दौरान वैज्ञानिकों को सैकड़ों अजीबो-गरीब और अधकचरे विचार सूझते। लेकिन इन सबको परखने का वक्त किसके पास है? इसलिए अगर वे किसी नई लीक से हटकर विचार से बचने की कोशिश करते हैं तो…’’

‘‘तो किसे दोष दिया जाए? मैं सहमत हूँ, लेकिन अगर लीक से हटकर सोचा गया विचार भी तर्कों पर आधारित हो और उसके पक्ष में सबूत भी हों तो क्या उसकी सुनवाई नहीं होनी चाहिए? निश्चित ही ऐसे किसी ठोस विचार को सैकड़ों अजीबो-गरीब और अधकचरे विचारों से अलग पहचानना कोई कठिन काम नहीं है। खासकर इसे प्रतिपादित करनेवाला वैज्ञानिक अपने क्षेत्र में अच्छी-खासी साख बना चुका हो; लेकिन इन फिजूल की बातों को छोड़कर हमें अपने सिद्धांत पर आना चाहिए।’’

‘‘ठीक है, वसंत। मुझे अपने सिद्धांत के बारे में बताओ और यह भी बताओ कि यह क्यों भविष्यवाणी करता है?’’ राजीव ने कहा।

वसंत ने संसार का नक्शा निकाला और उसे राजीव के सामने मेज पर फैला दिया।

‘‘यहाँ देखो, नक्शे में दरशाई गई ठोस जमीन पर गौर करो। इस जमीन ने नक्शे के कुल क्षेत्रफल का लगभग एक-तिहाई भाग घेर रखा है। बाकी सारा भाग पानी है—समुद्रों और महासागरों की शक्ल में। यही महासागर हमारी जलवायु को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके ऊपर की गरम हवा ऊपर उठती है और धरती के वायुमंडल में घुल-मिल जाती है तथा दोबारा नीचे आने से पहले चारों ओर फैल जाती है। ठीक?’’

‘‘यह सब तो स्कूल की किताबों में भी लिखा है।’’ राजीव ने कहा।

‘‘लेकिन हम हमेशा ही इसे यों ही लेते हैं कि महासागर गरम हैं और हमेशा गरम रहेंगे। किस हद तक यह सही है? कुछ साल पहले मैंने समुद्र की गहराइयों में तापमान मापा था। समुद्र का पानी ऊपरी स्तरों में गरम होता है और नीचे गहराइयों में ठंडा होता जाता है, इतना ठंडा कि बर्फ जम जाए। लेकिन मुझे यह देखकर अचंभा हुआ कि ऊपर की गरम परतें, जिन पर हमारी जलवायु निर्भर है, काफी पतली हैं और साल-दर-साल ये और ज्यादा पतली होती जा रही हैं।’’

‘‘पर सूर्य क्या कर रहा है? क्या वह महासागरों को पर्याप्त गरमी नहीं देता?’’ राजीव ने पूछा।

‘‘ऊष्मा के प्रत्यक्ष स्रोतों के तौर पर सूर्य बहुत ही अप्रभावी है। ध्रुवों पर गरमी के मौसम में चौबीसों घंटे कितनी चमकदार धूप होती है। पर इससे कितनी बर्फ पिघलती है? इसके बजाय बर्फ धूप को परावर्तित कर देती है और उसकी गरमी को अपने अंदर नहीं आने देती। लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से धूप ज्यादा कारगर साबित हो सकती है और होती है। अगर तुम मेरी प्रयोगशाला चलो तो मैं तुम्हें एक प्रयोग करके दिखाता हूँ।’’ इतना कहकर वसंत उठ खड़ा हुआ और राजीव को गलियारे के पास स्थित अपनी प्रयोगशाला में ले गया।

वहाँ उसकी मेज पर शीशे का एक बड़ा सा बरतन रखा था। एक उपकरण को चालू करते हुए वसंत ने समझाना शुरू किया, ‘‘मैं इस बरतन के अंदर की हवा को धीरे-धीरे ठंडा कर रहा हूँ। इसमें कुछ नमी है, यानी कि जलवाष्प। अगर मैं हवा को ठंडा करने की प्रक्रिया को सावधानी के साथ पूरी करूँ तो इसका तापमान 0 डिग्री से नीचे गिर जाना चाहिए और जलवाष्प को बर्फ में नहीं जमना चाहिए।’’

तापमान-सूचक नीचे गिर रहा था और जब वह शून्य से भी नीचे चला गया तब भी बर्फ नहीं जमी थी। तब वसंत ने बरतन के आर-पार एक प्रकाश-किरण छोड़ी। समकोण से देखने पर बरतन के भीतर बिलकुल अँधेरा नजर आ रहा था।

‘‘ऐसा इसलिए है, क्योंकि प्रकाश इस नम हवा के आर-पार गुजर जाता है।’’ वसंत ने समझाया, ‘‘पर अब मैं तापमान को और कम करूँगा।’’

जब तापमान 0 से 40 अंश नीचे तक गया तो बरतन चमकने लगा। यह परिवर्तन एकदम जादू जैसा लग रहा था।

‘‘ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि बरतन के भीतर हवा में मौजूद जलवाष्प अब जम गई है। बर्फ के कण प्रकाश को छितरा देते हैं, जबकि नम हवा ऐसा नहीं कर पाती। यही मुख्य बिंदु है।’’ वसंत ने कहा।

अपने कमरे में लौटते वक्त वसंत ने बताया, ‘‘यही क्रिया ध्रुवीय प्रदेशों में भी होती है। वहाँ पर जब तापमान 0 से 40 अंश तक नीचे गिर जाता है तो हवा में बर्फ के कण बन जाते हैं, जिन्हें हम ‘हीरे की धूल’ कहते हैं। ये वही बर्फ कण हैं जिन्हें तुमने अभी प्रयोग में देखा था। प्रयोग की तरह धु्रवों पर भी यह धूल धूप को छितरा देती है। अन्य जगहों पर हमें ऐसा होता नजर नहीं आता, क्योंकि कहीं भी तापमान कभी भी इतना नीचे नहीं गिरता है।’’

वसंत का बयान हालाँकि टेपरिकॉर्डर में दर्ज हो रहा था, लेकिन राजीव शाह अपने नोट बनाने में व्यस्त था। हालाँकि उसे अपने सवाल का जवाब अभी भी नहीं मिल पाया था। राजीव के चेहरे पर तैर रहे हैरानी के भावों को ताड़कर वसंत मुसकराया और आगे बोला, ‘‘अब मैं तुम्हें अपने सिद्धांत का लब्बोलुआब बताता हूँ। कल्पना करो कि महासागर ठंडे हो रहे हैं और वायुमंडल को पर्याप्त मात्रा में गरमी नहीं पहुँचा पाते हैं। इससे हर जगह का तापमान कम होता जाएगा और धु्रवीय प्रदेशों के अलावा अन्य जगहों पर भी हीरे की धूल बनने लगेगी और यह धूल क्या करेगी? धूप को छितराकर यह इसे जमीन तक पहुँचने से रोक देगी। कल्पना करो कि धूल का यह परदा धरती को आंशिक तौर पर ढक रहा है।’’

बात राजीव की समझ में आ गई। आगे की बात को उसी ने पूरा किया, ‘‘फिर धरती और ठंडी हो जाएगी। महासागर भी कम गरम होंगे। हीरे की धूल बढ़ती जाएगी और फैलती जाएगी। यह धूल धूप को ज्यादा-से-ज्यादा धरती पर पहुँचने से रोक देगी और हम हिम युग की ओर बढ़ते जाएँगे। लेकिन अगर महासागर गरम हों तो यह दुश्चक्र शुरू ही नहीं होने पाएगा।’’

‘‘रुको, रुको!’’ वसंत ने कहा, ‘‘आमतौर पर महासागरों की ऊपरी परत इतनी गरम तो होती है कि वह वायुमंडल को हीरे की धूल के खतरे से बचा सके। लेकिन अगर कुछ ऐसा हो जाए जिससे महासागरों के ठंडे होने का दुश्चक्र शुरू होने लगे तो फिर हम हिम युग से नहीं बच सकते। जैसे जब कभी कोई ज्वालामुखी फटता है तो उसके द्वारा उगले गए कण वायुमंडल में भी घुल-मिल सकते हैं। वहाँ वे धूप को सोख लेते हैं या छितराने लगते हैं। इसलिए अगर ज्वालामुखियों की गतिविधियाँ सामान्य से ज्यादा बढ़ जाएँ तो वायुमंडल में धूल का परदा बनने का खतरा बढ़ जाता है, जो धूप को गरम करने के अपने काम से रोकता है। जैसा कि मैंने कई साल पहले गौर किया था कि प्रकृति द्वारा निर्धारित सुरक्षा परत धीरे-धीरे पतली होती जा रही थी।’’ और अब राजीव को उस बातचीत का सिर-पैर समझ में आने लगा, जो पाँच साल पहले वाशिंगटन में हुई थी और यह भी समझ में आ गया कि वेसूवियस ज्वालामुखी के फटने की खबर सुनकर वसंत उतना चिंतित क्यों हो गया था।

और अब जबकि वसंत की आशंका सही साबित हो चुकी है तो आगे क्या होने वाला है?

भाग-2

‘हिम युग आ गया! भारतीय वैज्ञानिक ने भविष्यवाणी की थी’—यह शीर्षक था राजीव के सनसनीखेज आलेख का। इस आलेख को भारत में खूब वाहवाही मिली। बाद में यह विदेशी समाचार एजेंसियों द्वारा पूरी दुनिया में खूब प्रचारित-प्रसारित किया गया। जल्द ही वसंत चिटनिस एक जानी-मानी हस्ती बन गए। इस तथ्य से कि उन्होंने जलवायु में विनाशकारी बदलाव की वैज्ञानिक तौर पर काफी पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी, उन्हें आम जनता के बीच पर्याप्त मान-सम्मान मिला और अपने वैज्ञानिक सहयोगियों के बीच उनकी साख भी बहुत बढ़ गई। परिणामस्वरूप भविष्य के बारे में उनकी भविष्यवाणियों को गंभीरतापूर्वक लिया जाने लगा।

लेकिन अभी भी ऊँचे ओहदों पर जमे हुए वैज्ञानिक ऐसे थे जो हिम युग की शुरुआत से सहमत नहीं थे। वे मानते थे कि यह केवल जलवायु में अस्थायी गड़बड़ी है, जो बेशक बड़े पैमाने की है और असाधारण है, लेकिन है अस्थायी, जो जल्द ही ठीक हो जाएगी। उन्होंने जनता को भरोसा दिलाया कि पुराने व अच्छे गरम दिन कुछ साल के भीतर फिर लौट आएँगे। बस, महासागरों और उनके ऊपर की हवाओं के गरम एवं ठंडे होने के चक्र में संतुलन कायम हो जाए; लेकिन ठंड से जमे देशों को विश्वास दिलाना वाकई काफी कठिन था।

संसार के विख्यात पत्रकारों के सम्मेलन में वसंत ने दोबारा सुस्ती के खिलाफ चेताया, ‘‘हो सकता है कि अगली गरमी के मौसम में कुछ बर्फ पिघल जाए, लेकिन इसे हिम युग का अंत मत मानिए, क्योंकि उसके बाद आनेवाला सर्दी का मौसम और ज्यादा ठंडा होगा। इसे टालने का तरीका भी है; लेकिन उस तरीके को जल्द-से-जल्द अमल में लाना पड़ेगा। इस चक्र को उलट देना अभी भी संभव है, पर इसमें बहुत सारा धन खर्च होगा। कृपया इसे खर्च करें।’’

लेकिन इस चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ। अप्रैल में वसंत का मौसम आया और तापमान मामूली रूप से बढ़ा। उत्तरी गोलार्द्ध में हर जगह गरमी का मौसम चमकदार और गरम था, यहाँ तक कि दक्षिणी गोलार्द्ध में भी सर्दी का मौसम उतना ठंडा नहीं था जितना उत्तरी गोलार्द्ध में रह चुका था। इसलिए मौसम-विज्ञानी और अन्य लोग भविष्यवाणी करने लगे कि बर्फ पिघलने लगी है।

विंबल्डन के मैच अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हुए, हालाँकि खिलाडि़यों को गरम स्वेटर पहनकर खेलना पड़ा। हर कोई खुश था कि मैचों के दौरान बारिश नहीं हुई। ऑस्टे्रलिया ने दोबारा एशेज शृंखला जीत ली और इस बार कोई मौसम को दोष नहीं दे सका। यू. एस. ओपन गोल्फ के मैच भी बड़े आरामदेह मौसम में खेले गए, जिसकी कोई उम्मीद नहीं थी। नीचे विषुवतीय प्रदेशों में भी भयंकर गरमी का नामोनिशान नहीं था; लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून अपने समय पर और पर्याप्त मात्रा में आया।

तो हमें घबराने की कतई जरूरत नहीं थी। दुनिया के सभी छोटे-बड़े देशों ने सोचा, एक बार फिर भारत की भोली जनता ने लाल फीते में बँधी अपनी नौकरशाही का अहसान माना, जो अभी भी राजधानी को दिल्ली से मुंबई ले जाने के मनसूबे बाँध रही थी। गरमी का मौसम देखकर इन मनसूबों को भी बाँधकर इस टिप्पणी के साथ ताक पर रख दिया गया कि ‘अगली सूचना तक निर्णय स्थगित’।

लेकिन वसंत चिटनिस की चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी। एक लौ भी बुझने से पहले तेज रोशनी के साथ भकभकाती है। गरमी का मौसम उम्मीद के मुताबिक ही था। लेकिन कोई भी उनकी बात को सुनने के मूड में नहीं था।

लेकिन एक आदमी था राजीव शाह, जिसे वसंत के तर्कों पर पूर्ण विश्वास था। एक दिन जब राजीव अपने दफ्तर में बैठा टेलीप्रिंटर पर आई खबरों की काट-छाँट कर रहा था कि तभी वसंत वहाँ पर आ धमका। उसके चेहरे से राजीव ने ताड़ लिया कि उसके पास जरूर कोई खबर है।

‘‘लो, देखो यह टेलेक्स।’’ यह कहते हुए वसंत ने उसे एक छोटा सा संदेश पढ़ने के लिए दिया।

‘आपके निर्देशानुसार हमने अंटार्कटिक पर जमी हुई बर्फ की पैमाइश की है। हमने पक्का पता लगाया है कि बर्फ का क्षेत्रफल बढ़ा है और समुद्र के पानी का तापमान पहले की तुलना में दो अंश गिरा है।’

‘‘यह संदेश अंटार्कटिक में स्थापित अंतरराष्ट्रीय संस्थान से आया है।’’ वसंत ने कहा, ‘‘मुझे इसी नतीजे की उम्मीद थी; लेकिन मैं इसे पक्का करना चाहता था। बदकिस्मती से मेरी आशंका सही साबित हुई।’’

‘‘तुम्हारा मतलब है कि आनेवाली सर्दी में हमें और ज्यादा ठंड का सामना करना पड़ेगा?’’

‘‘बिलकुल ठीक, राजीव! तुम मेरे पूर्वग्रहग्रस्त वैज्ञानिक सहकर्मियों से कहीं ज्यादा समझदार हो । किसे परवाह है! हम सभी इन सर्दियों में जमकर मौत की नींद सोने जा रहे हैं।’’

‘‘चलो भी वसंत, क्या इतना बुरा हाल होने जा रहा है? क्या इस बर्फीले दुश्चक्र से निकलने का कोई रास्ता नहीं है?’’ राजीव ने पूछा।

‘‘रास्ता है, लेकिन अब मैं चुप रहूँगा, जब तक कि ये पूर्वग्रही और हठी वैज्ञानिक मुझसे आकर पूछते नहीं। हाँ, दोस्त होने के नाते मैं तुम्हें एक नेक सलाह जरूर दूँगा। भूमध्य रेखा के जितने निकट तुम जा सकते हो, चले जाओ। शायद अगले कुछ महीनों में इंडोनेशिया का मौसम कुछ बरदाश्त करने लायक बचे। मैं तो बानडुंग का टिकट खरीदने जा रहा हूँ।’’ और वसंत जल्दी से बाहर निकल गया।

मानव अपने आपको धरती का राजा कहता है; लेकिन जिस स्तर पर प्रकृति की शक्ति काम करती है उसके समक्ष मनुष्य की सबसे अच्छी तकनीकी भी बौनी है।

2 नवंबर को मुंबई के लोगों ने एक अद्भुत नजारा देखा। हजारों-हजार पक्षी आसमान में उड़े जा रहे थे। वे सारे-के-सारे पक्षी बहुत ही अनुशासित ढंग से उड़ रहे थे। पक्षी विज्ञानी अपने-अपने घरों से बाहर निकल आए, ताकि इस नजारे को देख सकें और कुछ सीख सकें। उनमें से अनेक पक्षी पहले कभी भी इस दिशा में उड़कर नहीं आए थे।

जल्द ही मुंबई के कौए, गौरैया और कबूतर भी इस झुंड में शामिल हो गए।

राजीव ने गौर किया कि वे सभी पक्षी दक्षिण दिशा की ओर जा रहे थे। उन पक्षियों ने अपनी सहज वृत्ति से वह जान लिया था जो मानव अपनी तमाम उन्नत तकनीकों के बल पर भी नहीं जान पाया था। स्पष्ट है कि पक्षियों में समझदारी थी और उन्होंने पिछले साल के अनुभवों से काफी कुछ सीखा था।

आखिरकार दो दिन बाद आसमान में मँडरा रहे मानव निर्मित उपग्रहों ने भी मौसम में किसी अनहोनी का पता लगा ही लिया। 4 नवंबर को एक चेतावनी प्रसारित की गई । वायुमंडलीय बदलाव तेजी से हो रहे हैं और इस बात के संकेत हैं कि अगले चौबीस घंटों के भीतर धरती पर अनेक जगहों पर भारी बर्फ गिरेगी। गर्व से गरदन अकड़ाए मौसम-विज्ञानियों ने बताया कि उनकी उन्नत तकनीकों के बगैर यह पूर्व चेतावनी नहीं आ सकती थी। उन्हें शायद मालूम नहीं था कि पक्षी काफी पहले ही भूमध्य रेखा के पास सुरक्षित जगहों पर पलायन कर चुके थे।

पक्षियों के समान अनुशासन के अभाव में मनुष्य के बीच भगदड़ मच गई। जापान, कनाडा, अमरीका और तकनीकी रूप से विकसित यूरोपीय देशों का भरोसा था कि पिछली सर्दियाँ बिता लेने के बाद वे इस बार फिर किसी भी तरह की ठंड का सामना कर लेंगे। लेकिन वे इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि उनके बड़े-बडे़ शहर भी पाँच मीटर मोटी बर्फ के तले दब जाएँ। नतीजा यह हुआ कि उसके बाद मची भगदड़ में केवल वे ही सौभाग्यशाली लोग बच पाए जो परमाणु हमलों से बचानेवाले बंकरों तक पहुँच सके। पारंपरिक तौर पर गरम देशों में ठंड का कहर कुछ कम था। लेकिन उनमें भी तैयारी के अभाव में काफी जनसंख्या हताहत हो गई।

राजीव शाह भी मद्रास में अपने चचेरे भाई के पास चला गया, लेकिन वहाँ भी ठंड के मारे बुरा हाल था। प्रमोद और कविता को भी अब बर्फ में खेलने में मजा नहीं आता था। अन्य लोगों की तरह वे भी पूछते कि अच्छे पुराने गरम दिन कब आएँगे। लेकिन आम आदमियों को छोडि़ए, विशेषज्ञ लोग भी यकीन के साथ कुछ भी बता पाने में असमर्थ थे। विशेषज्ञ लोगों में भी, जो पिछली सर्दी के मौसम को बेहद हलके रूप से ले रहे थे, ज्यादातर लोग मर-खप गए थे। उनमें से केवल एक व्यक्ति ही बच पाया, क्योंकि वह वाशिंगटन छोड़कर मियामी बीच पर आ गया था। वह रिचर्ड होम्स था, जो अमरीकी ऊर्जा बोर्ड का सदस्य था।

एक दिन अचानक उसके फोन ने राजीव को आश्चर्य में डाल दिया।

‘‘हाय राजीव! कैसे हो तुम? शर्तिया तुम मद्रास में गरम मौसम का मजा ले रहे हो, जबकि हम यहाँ मियामी में जमे जा रहे हैं।’’ रिचर्ड मजाकिया बनने की कोशिश कर रहा था। लेकिन राजीव को उसके शब्दों में छिपी चिंता का एहसास हो गया।

‘‘चलो भी रिचर्ड! वास्तव में तुम वहाँ पर अच्छे-खासे गरम घर में दिन गुजार रहे हो।’’ उसने कहा।

‘‘मियामी में गरम घर! तुम बचकानी बात कर रहे हो। लेकिन राजीव, मैंने वसंत का पता लगाने के लिए फोन किया है। तुम जानते हो न, वसंत चिटनिस, वह कहाँ गायब हो गया? मुंबई और दिल्ली के तो फोन काम ही नहीं कर रहे हैं।’’

‘‘जैसे कि इन शहरों के फोन कभी ठीक से काम करते ही नहीं।’’ राजीव बड़बड़ाया। उसके बाद उसने रिचर्ड को बानडुंग में वसंत का पता और फोन नंबर दिया।

‘‘मैं जानना चाहता हूँ कि वह इन सबका क्या मतलब निकालता है। हो सकता है, उसके पास इस संकट से निकलने का कोई रास्ता हो।’’ सूचना के लिए राजीव को धन्यवाद देते हुए रिचर्ड ने कहा।

अब अक्लमंद लोग भी बात करने को तैयार हैं। राजीव ने सोचा। कुछ महीने पहले इसी होम्स ने बुरे दिनों के लिए वसंत की भविष्यवाणी का मजाक उड़ाया था। पर अभी भी देर नहीं हुई थी, बशर्ते कि वसंत सुनने के मूड में हो।

‘‘आपके वाशिंगटन के क्या हाल-चाल हैं, रिचर्ड?’’ बानडुंग हवाई अड्डे पर रिचर्ड का स्वागत करते हुए वसंत ने पूछा।

‘‘वहाँ तो कोई नहीं बचा। दरअसल हमसे ज्यादा समझदार तो पक्षी ही निकले। उन्होंने समय पर अपने इलाकों को छोड़ दिया।’’ होम्स ने उत्तर दिया। पिछली मुलाकात की तुलना में इस बार उसके स्वर में वह जोश-खरोश नहीं था। उसे वसंत की प्रतिक्रिया का अनुमान नहीं था, इसलिए वह राजीव को भी साथ लाया था। अब वे चुपचाप वसंत के घर की ओर चले जा रहे थे।

‘‘तुमने भी अपने लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं तलाशी है। तुम नहीं जानते कि सारी दुनिया पर बर्फ कहर बरपा रही है। देखो, इन टेलेक्स और फैक्स संदेशों को देखो।’’ राजीव ने कागजों का पुलिंदा वसंत को थमा दिया।

वसंत ने उन कागजों को गौर से पढ़ा। अगर परिस्थितियाँ सामान्य होतीं तो वे सनसनीखेज सुर्खियाँ बन जातीं, पर अब कागजों पर लिखी बातें सामान्य लग रही थीं—

‘ब्रिटिश सरकार ने अपनी बाकी बची 40 प्रतिशत आबादी को केन्या पहुँचाने का कार्यक्रम पूरा होने की घोषणा की। इस कार्यक्रम को पूरा करने में दो महीने लगे।’

‘मॉस्को और लेनिनग्राद खाली कराए गए—रूसी प्रधानमंत्री की घोषणा।’

‘हम अपने भूमिगत ठिकानों में एक साल तक जिंदा रहेंगे—इजराइल के राष्ट्रपति।’

‘उत्तरी भारत में सभी नदियाँ पूरी तरह जम गईं, यू.एन.आई.की खबर।’

विस्तृत संदेशों को पढ़ने के बाद वसंत एक-एक कर कागज राजीव को थमाता गया। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। कागजों को पढ़ने के बाद उसने नपी-तुली टिप्पणी की, ‘‘पिछले साल तो हमने केवल एक झलक देखी थी। अब पूरा नजारा देखने को मिल रहा है। मुझे तो संदेह है कि हम अगला साल देखने के लिए जिंदा भी बचेंगे कि नहीं।’’

‘‘क्या इतना बुरा हाल होने जा रहा है?’’ राजीव ने चिंतित होकर पूछा।

‘‘क्या इसे टाला नहीं जा सकता है?’’ रिचर्ड ने पूछा।

‘‘अब शायद बहुत देर हो चुकी है, रिचर्ड, लेकिन हो सकता है कि मैं गलत हूँ। हम कोशिश कर सकते हैं, पर अब हमारे पास क्या विकल्प है? हमें इसे पिछले साल ही करना चाहिए था।’’

वसंत ने अपनी डेस्क से टाइप किए हुए कागजों का पुलिंदा निकाला। उसके ऊपर लिखा—‘परियोजना : इंद्र का आक्रमण’।

‘‘इंद्र स्वर्ग का राजा है, जिसका निवास ऊपर आसमान में है। वहीं सारी समस्याओं की जड़ है।’’ आसमान की तरफ उँगली उठाते हुए होम्स ने कहा और चुपचाप कागजों का वह पुलिंदा ले लिया—एक साल पहले वह इनकी तरफ देखना भी नहीं चाहता था।

बापू की बोली – (सुशोभित)

आशीष नंदी ने गाँधी और नेहरू की अंग्रेज़ी पर टिप्पणी करते हुए बड़ी सुंदर बात कही थी। उन्होंने कहा था कि “जहाँ नेहरू की सजी-सँवरी एडवर्डियन अंग्रेज़ी अब पुरानी लगती है (इंग्लैंड में एडवर्डियन काल विक्टोरियन काल के ठीक बाद माना जाता है), वहीं गाँधीजी की अंग्रेज़ी में बाइबिल जैसी सरलता है।” इसके आगे उन्होंने जोड़ा- “बहुत सारे लोग इस बात को समझ नहीं पाते कि गाँधीजी अंग्रेज़ी के विलक्षण लेखक थे और पश्चिम के असहमत चिंतकों का उनका ज्ञान असाधारण था।”

जब गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका में थे तो उन्होंने गुजराती और अंग्रेज़ी में ‘इंडियन ओपिनियन’ नामक पत्र निकाला। भारत में उन्होंने अंग्रेज़ी में ‘यंग इंडिया’ निकाला। गुजराती में ‘नवजीवन’ निकाला (आम्बेडकर ने आरोप लगाया था कि गाँधीजी अपने अंग्रेज़ी लेखन में उदारवादी विचार व्यक्त करते थे और गुजराती लेखन में परंपरावादी)! ‘हरिजन’ नामक पत्र उन्होंने तीन भाषाओं में निकाला- ‘हरिजन’ अंग्रेज़ी में, ‘हरिजन बंधु’ गुजराती में और ‘हरिजन सेवक’ हिन्दी में। ‘हिन्द स्वराज’ और ‘सत्य के प्रयोग’ उन्होंने मूल गुजराती में लिखी थीं। जीवन का लंबा समय उन्होंने वर्धा और सेवाग्राम में भी बिताया तो कालांतर में उनकी भाषा पर महाराष्ट्रीयन प्रभाव भी आ गया। ‘हिन्द स्वराज’ को उन्होंने स्वयं अंग्रेज़ी में अनूदित किया, ‘सत्य के प्रयोग’ महादेव भाई देसाई ने अनूदित की। चंपारण आंदोलन के बाद से उन्होंने हिन्दी पर ध्यान एकाग्र करना शुरू किया। इसको वे हिन्दुस्तानी ज़बान कहते थे और भारतीय राष्ट्रीय पहचान के लिए केंद्रीय महत्त्व की बतलाते थे। आज़ादी के बाद बीबीसी को उन्होंने जो कहा था, वो तो अब चिर स्मरणीय है- “दुनिया से कह दो कि गाँधी अंग्रेज़ी भूल गया।”

‘हिन्द स्वराज’ का गुजराती से हिन्दी अनुवाद अमृतलाल ठाकोरदास ने किया था और ‘सत्य के प्रयोग’ का गुजराती से हिन्दी अनुवाद काशीनाथ त्रिवेदी ने किया था। इन पुस्तकों को हिन्दी में पढ़ने का अपना ही सुख है। बाद के सालों में जब गाँधी हिन्दी में बोलने और लिखने लगे तो उसमें भी उनका वह गुजराती लहजा बरक़रार रहा। इस कारण गाँधीजी की भाषा अलग से ही पहचानी जाती है। वह अनगढ़ है, मुहावरेदार है, देशी है। और उसमें विचारों का तारतम्य लयपूर्ण रहता है, विश्रृंखल नहीं होता। यह वही चीज़ है, जिसे आशीष नंदी ने बाइबिल जैसी सरलता कहा है। इसमें बखान की एक कहन है, जो पाठक को जोड़ती है। एक वाक्य से जुड़कर दूसरा वाक्य बनता है और उसमें आप सिनर्जीकल प्रवाह देख सकते हैं।

विष्णु खरे ने गाँधीजी में एक धोखादेह सरलता पाई थी। और वैसा सोचने वाले वे अकेले नहीं थे। गाँधी की बहुत सारी बातें ऊपर से जितनी सरल दिखती हों, उनके भीतर एक गहरा आत्ममंथन रहता है। किंतु चूँकि गाँधी एक अकादमिक पृष्ठभूमि से नहीं आते थे, इसलिए उनके पास अपनी विचार श्रृंखला को बाँधने वाला वैसा भाषारूप नहीं था, जैसा कि नेहरू के पास था। इसी ने उनको सर्वव्यापी भी बना दिया। वे हमेशा जनसमुदाय को सीधे संबोधित कर सकते थे और उन तक अपनी बात पहुँचा सकते थे।

गाँधीजी की भाषा के बारे में एक नुस्ख़ा मैं आपको बतलाऊँ। जब गाँधीजी के बारे में सर्वत्र व्याप्त प्रलाप और आरोप-प्रत्यारोप और दोषारोपण से आप विचलित हो जावें तो एक काम करें। गाँधीजी की कोई भी पुस्तक उठाएँ और उसे किसी भी जगह से खोलकर एक-दो पन्ने पढ़ जाएँ। गाँधी हेरिटेज पोर्टल ने पचास हज़ार पृष्ठों का ‘संपूर्ण गाँधी वांग्मय’ सौ खंडों में प्रकाशित किया है, वो तो किसी सौभाग्यशाली के ही पास होगा, किंतु आपके पास गाँधीजी की जो भी पुस्तक हो, उसी को पढ़ने का यत्न कीजिए। भाषा में भावना होती है और आप इसे अनुभव कर सकते हैं। चतुराई से उसे कुछ देर तक ही छुपाया जा सकता है, दूर तक नहीं। गाँधीजी की भाषा में चाहे आग्रह हो, चाहे आत्मचिंतन, चाहे दैन्य, चाहे संकल्प, वह वैसी खरी भावना को व्यंजित करती है कि उसके पीछे कान लगाकर आप बापू की आवाज़ को सुन सकते हैं।

यह एक ऐसे मानुष की आवाज़ है, जो यह हमेशा जानता है कि सही क्या है, फिर भले उस सही के परिणाम चाहे जो हों। यह उस व्यक्ति का लहजा है, जिसने ज़माना देखा है, दीन-दुनिया के रंग-ढंग निरखे-परखे हैं, आदमी की ज़ात पहचानी है और अच्छाई और बुराई को लेकर उसके मन में कोई दुविधा नहीं है। सबसे बढ़कर उसको आदमी की अच्छाई पर अथाह भरोसा है। आप बाहर खड़े होकर प्रश्न पूछ सकते हैं कि इसको आप अच्छा क्यों कहते हैं और इसको बुरा क्यों कहते हैं, किंतु उस मानुष के भीतर वैसा कोई प्रश्न नहीं है। और यह उद्भावना उसकी भाषा में उतर आती है।

जब भी गाँधीजी पर संशय हो, समाधान के लिए किसी और के पास न जाएँ, स्वयं गाँधीजी के पास जाएँ-

“जो अच्छा होता है, वह बीरबहूटी की तरह धीरे चलता है। वह जल्दी नहीं करता। वह जानता है कि आदमी पर अच्छी बात का असर डालने में बहुत समय लगता है, बुरी बात ही तेज़ी से बढ़ जाती है। घर बनाना मुश्किल है, तोड़ना सहल है।” [‘हिन्द स्वराज’ से]

पक्षी और दीमक (कहानी) : गजानन माधव मुक्तिबोध | Pakshi aur Deemak Kahani

बाहर चिलचिलाती हुई दोपहर है; लेकिन इस कमरे में ठंडा मद्धिम उजाला है। यह उजाला इस बन्द खिड़की की दरारों से आता है। यह एक चौड़ी मुँडेरवाली बड़ी खिड़की है, जिसके बाहर की तरफ़, दीवार से लगकर, काँटेदार बेंत की हरी घनी झाड़ियाँ हैं। इनके ऊपर एक जंगली बेल चढ़कर फैल गई है; और उसने आसमानी रंग के गिलास जैसे अपने फूल प्रदर्शित कर रखे हैं। दूर से देखनेवालों को लगेगा कि उस बेल के फूल नहीं, वरन् बेंत की झाड़ियों के अपने फूल हैं।

किन्तु इससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि लता ने अपनी घुमावदार चाल से न केवल बेंत की डालों को, उनके काँटों से बचते हुए, जकड़ रखा है, वरन् उनके कंटक-रोमोंवाले पत्तों के एक-एक हरे फ़ीते को समेटकर, कसकर उनकी एक रस्सी-सी बना डाली है; और उस पूरी झाड़ी पर अपने फूल बिखराते-छिटकाते हुए, उन सौन्दर्य-प्रतीकों को सूरज और चाँद के सामने कर दिया है।

लेकिन, इस खिड़की को मुझे अकसर बन्द रखना पड़ता है। छत्तीसगढ़ के इस इलाके में, मौसम-बेमौसम आँधीनुमा हवाएँ चलती हैं। उन्होंने मेरी खिड़की के बन्द पल्लों को ढीला कर डाला है। खिड़की बन्द रखने का एक कारण यह भी है कि बाहर दीवार से लगकर खड़ी हुई हरी-घनी झाड़ियों के भीतर जो छिपे हुए, गहरे, हरे-साँवले अन्तराल हैं, उनमें पक्षी रहते हैं और अंडे देते हैं। वहाँ से कभी-कभी उनकी आवाज़ें, रात-बिरात, एकाएक सुनाई देती हैं। वे तीव्र भय की रोमांचक चीत्कारें हैं, क्योंकि वहाँ अपने शिकार की खोज में एक भुजंग आता रहता है। वह, शायद, उस तरफ़ की तमाम झाड़ियों के भीतर रेंगता फिरता है।

एक रात, इसी खिड़की में से एक भुजंग मेरे कमरे में भी आया। वह लगभग तीन फ़ीट लम्बा अजगर था। खूब खा-पी करके, सुस्त होकर, वह खिड़की के पास, मेरी साइकिल पर लेटा हुआ था। उसका मुँह ‘कैरियर’ पर, जिस्म की लपेट में, छिपा हुआ था और पूँछ चमकदार ‘हैंडिल’ से लिपटी हुई थी। ‘कैरियर’ से लेकर ‘हैंडिल’ तक की सारी लम्बाई को उसने अपने देह-वलयों से कस लिया था। उसकी वह काली-लम्बी-चिकनी देह आतंक उत्पन्न करती थी।

हमने बड़ी मुश्किल से उसके मुँह को शनाख्त किया। और फिर एकाएक ‘फ़िनाइल’ से उस पर हमला करके उसे बेहोश कर डाला। रोमांचपूर्ण थे हमारे वे व्याकुल आक्रमण! गहरे भय की सनसनी में अपनी कायरता का बोध करते हुए, हम लोग, निर्दयतापूर्वक, उसकी छटपटाती देह को लाठियों से मारे जा रहे थे।

उसे मरा हुआ जान, हम उसका अग्नि-संस्कार करने गए। मिट्टी के तेल की पीली-गेरुई ऊँची लपक उठाते हुए कंडों की आग में पड़ा हुआ वह ढीला नाग- शरीर, अपनी बची-खुची चेतना समेटकर, इतनी ज़ोर से ऊपर उछला कि घेरा डालकर खड़े हुए हम लोग, हैरत में आकर, एक क़दम पीछे हट गए। उसके बाद, रात-भर साँप की ही चर्चा होती रही।

इसी खिड़की से लगभग छह गज दूर, बेंत की झाड़ियों के उस पार, एक तालाब है…बड़ा भारी तालाब, आसमान का लम्बा-चौड़ा आईना, जो थरथराते हुए मुसकराता है। और उसकी थरथराहट पर किरने नाचती रहती हैं।

मेरे कमरे में जो प्रकाश आता है, वह इन लहरों पर नाचती हुई किरनों का उछलकर आया हुआ प्रकाश है। खिड़की की लम्बी दरारों में से गुज़रकर, वह प्रकाश, सामने की दीवार पर चौड़ी मुँडेर के नीचे सुन्दर झलमलाती हुई आकृतियाँ बनाता है।

मेरी दृष्टि उस प्रकाश-कम्प की ओर लगी हुई है। एक क्षण में उसकी अनगिनत लहरें नाचे जा रहीं हैं, नाचे जा रही हैं। कितना उद्दाम, कितना तीव्र वेग है उन झिलमिलाती लहरों में। मैं मुग्ध हूँ कि बाहर के लहराते तालाब ने किरनों की सहायता से अपने कम्पों की प्रतिच्छवि मेरी दीवाल पर आँक दी है।

काश, ऐसी भी कोई मशीन होती जो दूसरों के हृदय-कम्पनों को, उनकी मानसिक हलचलों को, मेरे मन के परदे पर, चित्र रूप में, उपस्थित कर सकती।

उदाहरणत:, मेरे सामने इसी पलंग पर, वह जो नारी-मूर्ति बैठी है। उसके व्यक्तित्व के रहस्य को मैं जानना चाहता हूँ, वैसे, उसके बारे में जितनी गहरी जानकारी मुझे है, शायद और किसी को नहीं।

इस धुँधले और अँधेरे कमरे में वह मुझे सुन्दर दिखाई दे रही है। दीवार पर गिरे हुए प्रत्यावर्तित प्रकाश का पुन: प्रत्यावर्तित प्रकाश, नीली चूडियोंवाले हाथों में थमे हुए उपन्यास के पन्नों पर, ध्यानमग्न कपोलों पर, और आसमानी आँचल पर फैला हुआ है। यद्यपि इस समय, हम दोनों अलग-अलग दुनिया में (वह उपन्यास के जगत में और मैं अपने ख़यालों के रास्ते पर) घूम रहे हैं, फिर भी इस अकेले धुँधले कमरे में गहन साहचर्य के सम्बन्ध-सूत्र तड़प रहे हैं और महसूस किए जा रहे हैं।

बावज़ूद इसके, यह कहना ही होगा कि मुझे इसमें ‘रोमांस’ नहीं दीखता। मेरे सिर का दाहिना हिस्सा सफ़ेद हो चुका है। अब तो मैं केवल आश्रय का अभिलाषी हूँ, ऊष्मापूर्ण आश्रय का…

फिर भी, मुझे शंका है। यौवन के मोह-स्वप्न का गहरा उद्दाम आत्मविश्वास अब मुझमें नहीं हो सकता। एक वयस्क पुरुष का अविवाहिता वयस्का स्त्री से प्रेम भी अजीब होता है। उसमें उद्बुद्ध इच्छा से आग्रह के साथ-साथ जो अनुभवपूर्ण ज्ञान का प्रकाश होता है, वह पल-पल पर शंका और सन्देह को उत्पन्न करता है।

श्यामला के बारे में शंका रहती है। वह ठोस बातों की बारीकियों का बड़ा आदर करती है। वह व्यवहार की कसौटी पर मनुष्य को परखती है। यह मुझे अखरता है। उसमें मुझे एक ठंडा पथरीलापन मालूम होता है। गीले-सपनीले रंगों का श्यामला में सचमुच अभाव है।

ठंडा पथरीलापन उचित है, या अनुचित, यह मैं नहीं जानता। किन्तु, जब औचित्य के सारे प्रमाण, उनका सारा वस्तु-सत्य, पॉलिशदार टीन-सा चमचमा उठता है तो, मुझे लगता है–बुरे फँसे, इन फालतू की अच्छाइयों में, तो दूसरी तरफ़ मुझे अपने भीतर ही कोई गहरी कमी महसूस होती है, और खटकने लगती है।

ऐसी स्थिति में, मैं ‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच में रहकर, खामोश, ‘जी हाँ’ की सूरत पैदा कर देता हूँ। डरता सिर्फ़ इस बात से हूँ कि कहीं यह ‘जी हाँ’, ‘जी हुजूर’ न बन जाए। मैं अतिशय शान्ति-प्रिय व्यक्ति हूँ। अपनी शान्ति भंग न हो, इसका बहुत ख़याल रखता हूँ। न झगड़ा करना चाहता हूँ, न मैं किसी झगड़े में फँसना चाहता…।

उपन्यास फेंककर श्यामला ने दोनों हाथ ऊँचे करके ज़रा-सी अँगड़ाई ली। मैं उसकी रूप-मुद्रा पर फिर से मुग्ध होना ही चाहता था कि उसने एक बेतुका प्रस्ताव सामने रख दिया। कहने लगी, ‘चलो, बाहर घूमने चलें।’

मेरी आँखों के सामने बाहर की चिलचिलाती सफ़ेदी और भयानक गरमी चमक उठी। ख़स के परदों के पीछे, छत के पंखों के नीचे, अलसाते लोग याद आए। भद्रता की कल्पना और सुविधा के भाव मुझे मना करने लगे। श्यामला के झक्कीपन का एक प्रमाण और मिला।

उसने मुझे एक क्षण आँखों से तौला और फ़ैसले के ढंग से कहा, ‘खैर, मैं तो जाती हूँ। देखकर चली आऊँगी…बता दूँगी।’

लेकिन चन्द मिनटों बाद, मैंने अपने को, चुपचाप, उसके पीछे चलते हुए पाया। तब दिल में एक अजीब झोल महसूस हो रहा था। दिमाग़ के भीतर सिकुड़न-सी पड़ गई थी। बाल अनसँवरे थे ही। पैरों को किसी-न-किसी तरह आगे ढकेले जा रहा था।

लेकिन, यह सिर्फ़ दुपहर के गरम तीरों के कारण था, या श्यामला के कारण, यह कहना मुश्किल है।

उसने पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखा और दिलासा देती हुई आवाज़ में कहा, ‘स्कूल का मैदान ज़्यादा दूर नहीं है।’

वह मेरे आगे-आगे चल रही थी, लेकिन मेरा ध्यान उसके पैरों और तलुओं के पिछले हिस्से की तरफ़ ही था। उसकी टाँग, जो बिवाइयों-भरी और धूल-भरी थी, आगे बढ़ने में, उचकती हुई चप्पल पर चटचटाती थी। ज़ाहिर था कि ये पैर धूल-भरी सड़कों पर घूमने के आदी हैं।

यह ख़याल आते ही, उसी ख़याल से लगे हुए न मालूम किन धागों से होकर, मैं श्यामला से ख़ुद को कुछ कम, कुछ हीन पाने लगा; और इसकी ग्लानि से उबरने के लिए, मैं उस चलती हुई आकृति के साथ, उसके बराबर हो लिया। वह कहने लगी, ‘याद है शाम को बैठक है। अभी चलकर न देखते तो कब देखते! और सबके सामने साबित हो जाता है कि तुम ख़ुद कुछ करते नहीं। सिर्फ़ जबान की कैंची चलती है।’

अब श्यामला को कौन बताए कि न मैं इस भरी दोपहर में स्कूल का मैदान देखने जाता और न शाम को बैठक में ही। सम्भव था कि ‘कोरम’ पूरा न होने के कारण बैठक ही स्थगित हो जाती। लेकिन श्यामला को यह कौन बताए कि हमारे आलस्य में भी एक छिपी हुई, जानी-अनजानी योजना रहती है। वर्तमान संचालन का दायित्व जिन पर है, वे ख़ुद संचालक-मंडल की बैठक नहीं होने देना चाहते। अगर श्यामला से कहूँ तो वह पूछेगी, ‘क्यों!’

फिर मैं क्या जवाब दूँगा? मैं उसकी आँखों से गिरना नहीं चाहता, उसकी नज़र में और-और चढ़ना चाहता हूँ। उसका प्रेमी जो हूँ; अपने व्यक्तित्व का सुन्दरतम चित्र उपस्थित करने की लालसा भी तो रहती है।

वैसे भी, धूप इतनी तेज़ थी कि बात करने या बात बढ़ाने की तबीयत नहीं हो रही थी।

मेरी आँखें सामने के पीपल के पेड़ की तरफ़ गईं, जिसकी एक डाल, तालाब के ऊपर, बहुत ऊँचाई पर, दूर तक चली गई थी। उसके सिरे पर एक बड़ा-सा भूरा पक्षी बैठा हुआ था। उसे मैंने चील समझा। लगता था कि वह मछलियों के शिकार की ताक लगाए बैठा है।

लेकिन उसी शाखा की बिलकुल विरुद्ध दिशा में, जो दूसरी डालें ऊँची होकर तिरछी और बाँकी-टेढ़ी हो गई हैं, उन पर झुंड के झुंड कौवे काँव- काँव कर रहे हैं मानो वे चील की शिकायत कर रहे हों और उचक-उचककर, फुदक-फुदककर, मछली की ताक में बैठे उस पक्षी के विरुद्ध प्रचार किए जा रहे हों।

कि इतने में मुझे उस मैदानी-आसमानी चमकीले खुले-खुलेपन में एकाएक, सामने दिखाई देता है–साँवले नाटे कद पर भगवे रंग की खद्दर का बंडीनुमा कुरता, लगभग चौरस मोटा चेहरा, जिसके दाहिने गाल पर एक बड़ा-सा मस्सा है, और उस मस्से में से बारीक बाल निकले हुए।

जी धँस जाता है उस सूरत को देखकर। वह मेरा नेता है, संस्था का सर्वेसर्वा है। उसकी ख़याली तसवीर देखते ही मुझे अचानक दूसरे नेताओं की और सचिवालय के उस अँधेरे गलियारे की याद आती है, जहाँ मैंने इस नाटे-मोटे भगवे खद्दर कुरतेवाले को पहले-पहल देखा था।

उन अँधेरे गलियारों में से कई-कई बार गुज़रा हूँ और वहाँ किसी मोड़ पर, किसी कोने में इकट्ठा हुए, ऐसी ही संस्थाओं के संचालकों के उतरे हुए चेहरों को देखा है। बावज़ूद श्रेष्ठ पोशाक और ‘अपटूडेट’ भेस के, सँवलाया हुआ गर्व, बेबस गम्भीरता, अधीर उदासी और थकान उनके व्यक्तित्व पर राख-सी मलती है। क्यों?

इसलिए कि माली साल की आख़िरी तारीख़ को अब सिर्फ़ दो या तीन दिन बचे हैं। सरकारी ‘ग्रांट’ अभी मंजूर नहीं हो पा रही है, काग़ज़ात अभी वित्त विभाग में ही अटके पड़े हैं। ऑफ़िसों के बाहर, गलियारे के दूर किसी कोने में, पेशाबघर के पास, या होटलों के कोनों में क्लर्कों की मुट्ठियाँ गरम की जा रही हैं, ताकि ‘ग्रांट’ मंजूर हो और जल्दी मिल जाए।

ऐसी ही किसी जगह पर मैंने इस भगवे खद्दर-कुरतेवाले को ज़ोर-ज़ोर से अँगरेज़ी बोलते हुए देखा था। और, तभी मैंने उसके तेज़ मिजाज़ और फ़ितरती दिमाग़ का अन्दाज़ा लगाया था।

इधर, भरी दोपहर में, श्यामला का पार्श्व-संगीत चल ही रहा है, मैं उसका कोई मतलब नहीं निकाल पाता। लेकिन, न मालूम कैसे, मेरा मन उसकी बातों से कुछ संकेत ग्रहण कर, अपने ही रास्ते पर चलता रहता है। इसी बीच उसके एक वाक्य से मैं चौंक पड़ा, ‘इससे अच्छा है कि तुम इस्तीफा दे दो। अगर काम नहीं कर सकते तो गद्दी क्यों अड़ा रखी है।’

इसी बात को, कई बार, मैंने अपने से भी पूछा था। लेकिन आज उसके मुँह से ठीक उसी बात को सुनकर मुझे धक्का-सा लगा। और, मेरा मन कहाँ-का-कहाँ चला गया।

एक दिन की बात। मेरा सजा हुआ कमरा। चाय की चुस्कियाँ। क़हक़हे।

एक पीेले रंग के तिकोने चेहरेवाला मसख़रा, ऊल-जलूल शख़्स। बग़ैर यह सोचे कि जिसकी वह निन्दा कर रहा है, वह मेरा कृपालु मित्र और सहायक है, वह शख़्स बात बढ़ाता जा रहा है।

मैं स्तब्ध। किन्तु, कान सुन रहे हैं। हारे हुए आदमी जैसी मेरी सूरत, और मैं!

वह कहता जा रहा है, ‘सूक्ष्मदर्शी यंत्र? सूक्ष्मदर्शी यंत्र कहाँ हैं?’

‘हैं तो। ये हैं। देखिए।’ क्लर्क कहता है। रजिस्टर बताता है। सब कहते हैं–हैं, हैं। ये हैं। लेकिन, कहाँ हैं? यह तो सब लिखित रूप में हैं, वस्तु-रूप में कहाँ हैं!

‘वे ख़रीदे ही नहीं गए हैं! झूठी रसीद लिखने का कमीशन विक्रेता को, शेष रक़म जेब में। सरकार से पूरी रक़म वसूल!

‘किसी ख़ास जाँच के ऐन मौक़े पर किसी दूसरे शहर की…संस्था से उधार लेकर, सूक्ष्मदर्शी यंत्र हाज़िर! सब चीज़ें, मौज़ूद हैं। आइए, देख जाइए। जी हाँ, ये तो हैं सामने। लेकिन, जाँच ख़त्म होने पर सब गायब, अन्तर्धान। कैसा जादू है। ख़र्चे का आँकड़ा खूब फुलाकर रखिए। सरकार के पास काग़ज़ात भेज दीजिए। ख़ास मौक़ों पर ऑफ़िसों के धुँधले गलियारों और होटलों के कोनों में मुट्ठियाँ गरम कीजिए। सरकारी ‘ग्रांट’ मंजूर! और, उसका न जाने कितना हिस्सा, बड़े ही तरीक़े से संचालकों की जेब में! जी!’

भरी दोपहर में मैं आगे बढ़ा जा रहा हूँ। कानों में ये आवाज़ेें गूँजती जा रही हैं। मैं व्याकुल हो उठता हूँ। श्यामला का पार्श्वसंगीत चल रहा है। मुझे ज़बरदस्त प्यास लगती है! पानी, पानी!

कि इतने में एकाएक विश्वविद्यालय के पुस्तकालय की ऊँचे रोमन स्तम्भोंवाली इमारत सामने आ जाती है। तीसरा पहर। हलकी धूप। इमारत की पत्थर-सीढ़ियाँ, लम्बी, मोतिया।

सीढ़ियों से लगकर, अभ्रक-मिली लाल मिट्टी के चमचमाते रास्ते पर सुन्दर काली ‘शेवरलेट’।

भगवे खद्दर-कुरतेवाले की ‘शेवरलेट’, जिसके ज़रा पीछे मैं खड़ा हूँ, और देख रहा हूँ–यों ही–कार का नम्बर–कि इतने में उसके चिकने काले हिस्से में, जो आईने-सा चमकदार है, मेरी सूरत दिखाई देती है।

भयानक है वह सूरत। सारे अनुपात बिगड़ गए हैं। नाक डेढ़ गज लम्बी और कितनी मोटी हो गई है। चेहरा बेहद लम्बा और सिकुड़ गया है। आँखें खड्डेदार। कान नदारद। भूत-जैसा अप्राकृतिक रूप। मैं अपने चेहरे की उस विद्रूपता को, मुग्ध भाव से, कुतूहल से और आश्चर्य से देख रहा हूँ, एकटक!

कि इतने में मैं दो क़दम एक ओर हट जाता हूँ; और पाता हूँ कि मोटर के उस काले चमकदार आईने में, मेरे गाल; ठुड्डी, नाक, कान सब चौड़े हो गए हैं, एकदम चौड़े। लम्बाई लगभग नदारद। मैं देखता ही रहता हूँ, देखता ही रहता हूँ कि इतने में दिल के किसी कोने में कोई अँधियारा गटर एकदम फूट निकलता है। वह गटर है आत्मालोचन, दु:ख और ग्लानि का।

और, सहसा, मुँह से हाय निकल पड़ती है। उस भगवे खद्दर-कुरतेवाले से मेरा छुटकारा कब होगा, कब होगा!

और, तब लगता है कि इस सारे जाल में, बुराई की इस अनेक चक्रोंवाली दैत्याकार मशीन में न जाने कब से मैं फँसा पड़ा हूँ। पैर भिंच गए हैं, पसलियाँ चूर हो गई हैं, चीख़ निकल नहीं पाती, आवाज़ हलक़ में फँसकर रह गई है।

कि इसी बीच अचानक एक नज़ारा दिखाई देता है रोमन स्तम्भोंवाली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय की ऊँची, लम्बी मोतिया सीढ़ियों पर से उतर रही है एक आत्मविश्वासपूर्ण गौरवमय नारीमूर्ति।

वह किरणीली मुसकान मेरी ओर फेंकती-सी दिखाई देती है। मैं इस स्थिति में नहीं हूँ कि उसका स्वागत कर सकूँ। मैं बदहवास हो उठता हूँ।

वह धीमे-धीमे मेरे पास आती है, अ यर्थनापूर्ण मुसकराहट के साथ कहती है, ‘पढ़ी है आपने यह पुस्तक?’

काली ज़िल्द पर सुनहले रोमन अक्षरों में लिखा है, ‘आई विल नॉट रेस्ट।’

मैं साफ़ झूठ बोल जाता हूँ, ‘हाँ पढ़ी है, बहुत पहले।’

लेकिन, मुझे महसूस होता है कि मेरे चेहरे से तेलिया पसीना निकल रहा है। मैं बार-बार अपना मुँह पोंछता हूँ रूमाल से। बालों के नीचे ललाट–हाँ ललाट (यह शब्द मुझे अच्छा लगता है) को रगड़कर साफ़ करता हूँ।

और, फिर दूर एक पेड़ के नीचे, इधर आते हुए, भगवे खद्दर-कुरतेवाले की आकृति को देखकर श्यामला से कहता हूँ, ‘अच्छा, मैं ज़रा उधर जा रहा हूँ। फिर भेंट होगी।’ और, सभ्यता के तकाज़े से मैं उसके लिए नमस्कार के रूप में मुसकराने की चेष्टा करता हूँ।

पेड़!

अजीब पेड़ है, (यहाँ रुका जा सकता है), बहुत पुराना पेड़ है, जिसकी जड़ें उखड़कर बीच में से टूट गई हैं, और जो साबुत हैं, उनके आस-पास की मिट्टी खिसक गई है। इसलिए वे उभरकर ऐंठी हुई-सी लगती है। पेड़ क्या है, लगभग ठूँठ है। उसकी शाखाएँ काट डाली गई हैं।

लेकिन, कटी हुई बाँहोंवाले उस पेड़ में से नई डालें निकलकर, हवा में खेल रही हैं। उन डालों में कोमल-कोमल हरी-हरी पत्तियाँ झालर-सी दिखाई देती हैं। पेड़ के मोटे तने में से जगह-जगह ताजा गोंद निकल रहा है। गोंद की साँवली कत्थई गठानें मज़े में देखी जा सकती हैं।

अजीब पेड़ है, अजीब! (शायद, यह अच्छाई का पेड़ है) इसलिए कि एक दिन शाम की मोतिया-गुलाबी आभा में मैंने एक युवक-युवती को इस पेड़ के तले ऊँची उठी हुई जड़ पर आराम से बैठे हुए पाया था। सम्भवत:, वे अपने अत्यन्त आत्मीय क्षणों में डूबे हुए थे।

मुझे देखकर युवक ने आदरपूर्वक नमस्कार किया। लड़की ने भी मुझे देखा और झेंप गई। हलके झटके से उसने अपना मुँह दूसरी ओर कर लिया। लेकिन उसकी झेंपती हुई ललाई मेरी नज़रों से न बच सकी।

इस प्रेम-मुग्ध युग्म को देखकर मैं भी एक विचित्र आनन्द में डूब गया। उन्हें निरापद करने के लिए, जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ मैं वहाँ से नौ-दो ग्यारह हो गया।

यह पिछली गरमियों की एक मनोहर साँझ की बात है। लेकिन आज इस भरी दोपहरी में श्यामला के साथ पल-भर उस पेड़ के तले बैठने को मेरी भी तबीयत हुई। बहुत ही छोटी और भोली इच्छा है यह!

लेकिन, मुझे लगा कि शायद श्यामला मेरे सुझाव को नहीं मानेगी। स्कूल मैदान पहुँचने की उसे जल्दी जो है। कहने की मेरी हि मत ही नहीं हुई।

लेकिन, दूसरे क्षण, आप-ही-आप, मेरे पैर उस ओर बढ़ने लगे। और, ठीक उसी जगह मैं भी जाकर बैठ गया, जहाँ एक साल पहले वह युग्म बैठा था। देखता क्या हूँ कि श्यामला भी आकर बैठ गई है।

तब वह कह रही थी, ‘सचमुच बड़ी गरम दोपहर है।’

सामने, मैदान-ही-मैदान हैं, भूरे मटमैले! उन पर सिरस और सीसम के छायादार विराम-चिह्न खड़े हुए हैं। मैं लुब्ध और मुग्ध होकर उनकी घनी-गहरी छायाएँ देखता रहता हूँ…।

…क्योंकि…क्योंकि मेरा यह पेड़, यह अच्छाई का पेड़, छाया प्रदान नहीं कर सकता, आश्रय प्रदान नहीं कर सकता, (क्योंकि वह जगह-जगह काटा गया है) वह तो कटी शाखाओं की दूरियों और अन्तरालों में से केवल तीव्र और कष्टप्रद प्रकाश को ही मार्ग दे सकता है।

लेकिन, मैदानों के इस चिलचिलाते अपार विस्तार में, एक पेड़ के नीचे, अकेलेपन में, श्यामला के साथ रहने की यह जो मेरी स्थिति है उसका अचानक मुझे गहरा बोध हुआ। लगा कि श्यामला मेरी है, और वह भी इसी भाँति चिलचिलाते गरम तत्त्वों से बनी हुई नारी-मूर्ति है। गरम बफती हुई मिट्टी-सा चिलचिलाता हुआ, उसमें अपनापन है।

तो क्या, आज ही, अगली अनगिनत गरम दोपहरियों के पहले, आज ही, अगले क़दम उठाए जाने के पहले, इसी समय, हाँ इसी समय, उसके सामने, अपने दिल की गहरी छिपी हुई तहें और सतहें खोलकर रख दूँ…कि जिससे आगे चलकर, उसे ग़लतफ़हमी में रखने, उसे धोखे में रखने का अपराधी न बनूँ!

कि इतने में, मेरी आँखों के सामने, फिर उसी भगवे खद्दर-कुरतेवाले की तसवीर चमक उठी। मैं व्याकुल हो गया, और उससे छुटकारा चाहने लगा।

तो फिर आत्म-स्वीकार कैसे करूँ, कहाँ से शुरू करूँ! लेकिन, क्या वह मेरी बातें समझ सकेगी? किसी तनी हुई रस्सी पर वजन साधते हुए चलने का, ‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच में रहकर ज़िन्दगी की उलझनों में फँसने का, तजुर्बा उसे कहाँ है!

हटाओ, कौन कहे!

लेकिन, यह स्त्री शिक्षिता तो है! बहस भी तो करती है! बहस की बातों का सम्बन्ध न उसके स्वार्थ से होता है, न मेरे। उस समय हम लड़ भी तो सकते हैं। और ऐसी लड़ाइयों में कोई स्वार्थ भी तो नहीं होता। उसके सामने अपने दिल की सतहें खोल देने में न मुझे शर्म रही, न मेरे सामने उसे। लेकिन, वैसा करने में तकलीफ़ तो होती है, अजीब और पेचीदा, घूमती-घुमाती तकलीफ़!

और उस तकलीफ़ को टालने के लिए हम झूठ भी तो बोल देते हैं, सरासर झूठ, सफ़ेद झूठ! लेकिन झूठ से सच्चाई और गहरी हो जाती है, अधिक महत्त्चपूर्ण और अधिक प्राणवान, मानो वह हमारे लिए और सारी मनुष्यता के लिए विशेष सार रखती हो। ऐसी सतह पर हम भावुक हो जाते हैं। और, यह सतह अपने सारे निजीपन में बिलकुल बेनिजी है। साथ ही, मीठी भी! हाँ, उस स्तर की अपनी विचित्र पीड़ाएँ हैं, भयानक सन्ताप हैं, और इस अत्यन्त आत्मीय किन्तु निर्वैयक्तिक स्तर पर, हम एक हो जाते हैं, और कभी-कभी ठीक उसी स्तर पर बुरी तरह लड़ भी पड़ते हैं।

श्यामला ने कहा, ‘उस मैदान को समतल करने में कितना खर्च आएगा?’

‘बारह हज़ार।’

‘उनका अन्दाज़ क्या है?’

‘बीस हज़ार।’

‘तो बैठक में जाकर समझा दोगे और यह बता दोगे कि कुल मिलाकर बारह हज़ार से ज़्यादा नामुमकिन है?’

‘हाँ, उतना मैं कर दूँगा।’

‘उतना का क्या मतलब?’

अब मैं उसे ‘उतना’ का क्या मतलब बताऊँ! साफ़ है कि उस भगवे खद्दर कुरतेवाले से मैं दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहता। मैं उसके प्रति वफ़ादार रहूँगा क्योंकि मैं उसका आदमी हूँ। भले ही वह बुरा हो, भ्रष्टाचारी हो, किन्तु उसी के कारण मेरी आमदनी के ज़रिए बने हुए हैं! व्यक्ति-निष्ठा भी कोई चीज़ है, उसके कारण ही मैं विश्वास-योग्य माना गया हूँ। इसलिए, मैं कई महत्त्वपूर्ण कमेटियों का सदस्य हूँ।

मैंने विरोध-भाव से श्यामला की तरफ़ देखा। वह मेरा रुख देखकर समझ गई। वह कुछ नहीं बोली। लेकिन, मानो मैंने उसकी आवाज़ सुन ली हो।

श्यामला का चेहरा ‘चार जनियों-जैसा’ है। उस पर साँवली मोहक दीप्ति का आकर्षण है। किन्तु, उसकी आवाज़…हाँ आवाज़…वह इतनी सुरीली और मीठी है कि उसे अनसुना करना निहायत मुश्किल है। उस स्वर को सुनकर, दुनिया की अच्छी बातें ही याद आ सकती हैं।

पता नहीं किस तरह की परेशान पेचीदगी मेरे चेहरे पर झलक उठी कि जिसे देखकर उसने कहा, ‘कहो, कहो, क्या कहना चाहते हो।’

यह वाक्य मेरे लिए निर्णायक बन गया। फिर भी, अवरोध शेष था। अपने जीवन का सार-सत्य अपना गुप्त-धन है। उसके अपने गुप्त संघर्ष हैं, उसका अपना एक गुप्त नाटक है। वह प्रकट करते नहीं बनता। फिर भी, शायद है कि उसे प्रकट कर देने से उसका मूल्य बढ़ जाए, उसका कोई विशेष उपयोग हो सके।

एक था पक्षी। वह नीले आसमान में खूब ऊँचाई पर उड़ता जा रहा था। उसके साथ उसके पिता और मित्र भी थे।

(श्यामला मेरे चेहरे की तरफ़ आश्चर्य से देखने लगी।)

सब, बहुत ऊँचाई पर उड़नेवाले पक्षी थे। उनकी निगाहें भी बड़ी तेज़ थीं। उन्हें दूर-दूर की भनक और दूर-दूर की महक भी मिल जाती।

एक दिन वह नौजवान पक्षी ज़मीन पर चलती हुई एक बैलगाड़ी को देख लेता है। उसमें बड़े-बड़े बोरे भरे हुए हैं। गाड़ीवाला चिल्ला-चिल्लाकर कहता है, ‘दो दीमकें लो, एक पंख दो।’

उस नौजवान पक्षी को दीमकों का शौक़ था। वैसे तो ऊँचे उड़नेवाले पंछियों को, हवा में ही बहुत-से कीड़े तैरते हुए मिल जाते, जिन्हें खाकर वे अपनी भूख थोड़ीबहुत शान्त कर लेते।

लेकिन दीमकें सिर्फ़ ज़मीन पर मिलती थीं। कभी-कभी पेड़ों पर–ज़मीन से तने पर चढ़कर, ऊँची डाल तक, वे मटियाला लम्बा घर बना लेतीं। लेकिन, ऐसे कुछ ही पेड़ होते, और वे सब एक जगह न मिलते।

नौजवान पक्षी को लगा–यह बहुत बड़ी सुविधा है कि आदमी दीमकों को बोरों में भरकर बेच रहा है।

वह अपनी ऊँचाइयाँ छोड़कर मँडराता हुआ नीचे उतरता है, और पेड़ की एक डाल पर बैठ जाता है।

दोनों का सौदा तय हो जाता है। अपनी चोंच से एक पर को खींचकर तोड़ने में उसे तकलीफ़ भी होती है; लेकिन उसे वह बरदाश्त कर लेता है। मुँह में बड़े स्वाद के साथ दो दीमकें दबाकर वह पक्षी फुर्र से उड़ जाता है।

(कहते-कहते मैं थक गया शायद साँस लेने के लिए। श्यामला ने पलकें झपकाईं और कहा, ‘हूँ’।)

अब उस पक्षी को गाड़ीवाले से दो दीमकें ख़रीदने और एक पर देने की बड़ी आसानी मालूम हुई। वह रोज़ तीसरे पहर नीचे उतरता और गाड़ीवाले को एक पंख देकर, दो दीमकें ख़रीद लेता।

कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। एक दिन उसके पिता ने देख लिया। उसने समझाने की कोशिश की कि बेटे, दीमकें हमारा स्वाभाविक आहार नहीं हैं, और उनके लिए अपने पंख तो हरगिज़ नहीं दिए जा सकते।

लेकिन, उस नौजवान पक्षी ने बड़े ही गर्व से अपना मुँह दूसरी ओर कर लिया। उसे ज़मीन पर उतरकर दीमकें खाने की चट लग गई थी। अब उसे न तो दूसरे कीड़े अच्छे लगते, न फल, न अनाज के दाने। दीमकों का शौक़ अब उस पर हावी हो गया था।

(श्यामला अपनी फैली हुई आँखों से मुझे देख रही थी, उसकी ऊपर उठी हुई पलकें और भँवें बड़ी ही सुन्दर दिखाई दे रही थीं।)

लेकिन, ऐसा कितने दिनों तक चलता। उसके पंखों की संख्या लगातार घटती चली गई। अब वह, ऊँचाइयों पर, अपना सन्तुलन साध नहीं सकता था, न बहुत समय तक पंख उसे सहारा दे सकते थे। आकाश-यात्रा के दौरान उसे, जल्दी-जल्दी पहाड़ी चट्टानों, पेड़ों की चोटियों, गुम्बदों और बुर्जों पर हाँफते हुए बैठ जाना पड़ता। उसके परिवारवाले तथा मित्र ऊँचाइयों पर तैरते हुए आगे बढ़ जाते। वह बहुत पिछड़ जाता। फिर भी दीमक खाने का उसका शौक़ कम नहीं हुआ। दीमकों के लिए गाड़ीवाले को वह अपने पंख तोड़-तोड़कर देता रहा।

(श्यामला गम्भीर होकर सुन रही थी। अब की बार उसने ‘हूँ’ भी नहीं कहा।)

फिर, उसने सोचा कि आसमान में उड़ना ही फ़िजूल है। वह मूर्खों का काम है। उसकी हालत यह थी कि अब वह आसमान में उड़ ही नहीं सकता था, वह सिर्फ़ एक पेड़ से उड़कर दूसरे पेड़ तक पहुँच पाता। धीरे-धीरे उसकी यह शक्ति भी कम होती गई। और एक समय वह आया जब वह बड़ी मुश्किल से, पेड़ की एक डाल से लगी हुई दूसरी डाल पर, चलकर, फुदककर पहुँचता। लेकिन दीमक खाने का शौक़ नहीं छूटा।

बीच-बीच में गाड़ीवाला बुत्ता दे जाता। वह कहीं नज़र में न आता। पक्षी उसके इन्तज़ार में घुलता रहता।

लेकिन, दीमकों का शौक़ जो उसे था। उसने सोचा, ‘मैं ख़ुद दीमकें ढूँढूँगा।’ इसलिए वह पेड़ पर से उतरकर ज़मीन पर आ गया; और घास के एक लहराते गुच्छे में सिमटकर बैठ गया।

(श्यामला मेरी ओर देखे जा रही थी। उसने अपेक्षापूर्वक कहा, ‘हूँ।’)

फिर, एक दिन उस पक्षी के जी में न मालूम क्या आया। वह खूब मेहनत से ज़मीन में से दीमकें चुन-चुनकर, खाने के बजाय, उन्हें इकट्ठा करने लगा। अब उसके पास दीमकों के ढेर के ढेर हो गए।

फिर, एक दिन एकाएक, वह गाड़ीवाला दिखाई दिया। पक्षी को बड़ी खुशी हुई। उसने पुकारकर कहा, ‘गाड़ीवाले, ओ गाड़ीवाले! मैं कब से तुम्हारा इन्तज़ार कर रहा था।’

पहचानी आवाज़ सुनकर गाड़ीवाला रुक गया। तब पक्षी ने कहा, ‘देखो, मैंने कितनी सारी दीमकें जमा कर ली हैं।’

गाड़ीवाले को पक्षी की बात समझ में नहीं आई। उसने सिर्फ़ इतना कहा, ‘तो मैं क्या करूँ।’

‘ये मेरी दीमकें ले लो, और मेरे पंख मुझे वापस कर दो।’ पक्षी ने जवाब दिया। गाड़ीवाला ठठाकर हँस पड़ा। उसने कहा, ‘बेवकूफ़, मैं दीमक के बदले पंख लेता हूँ, पंख के बदले दीमक नहीं!’

गाड़ीवाले ने ‘पंख’ शब्द पर बहुत ज़ोर दिया था।

(श्यामला ध्यान से सुन रही थी। उसने कहा, ‘फिर?’)

गाड़ीवाला चला गया। पक्षी छटपटाकर रह गया। एक दिन एक काली बिल्ली आई और अपने मुँह में उसे दबाकर चली गई। तब उस पक्षी का खून टपक-टपककर ज़मीन पर बूँदों की लकीर बना रहा था।

(श्यामला ध्यान से मुझे देखे जा रही थी; और उसकी एकटक निगाहों से बचने के लिए मेरी आँखें तालाब की सिहरती-काँपती, चिलकती-चमकती लहरों पर टिकी हुई थीं।)

कहानी कह चुकने के बाद, मुझे एक ज़बरदस्त झटका लगा। एक भयानक प्रतिक्रिया–कोलतार-जैसी काली, गन्धक-जैसी पीली-नारंगी।

‘नहीं, मुझमेें अभी बहुत कुछ शेष है, बहुत कुछ। मैं उस पक्षी-जैसा नहीं मरूँगा। मैं अभी भी उबर सकता हूँ। रोग अभी असाध्य नहीं हुआ है। ठाठ से रहने के चक्कर से बँधे हुए बुराई के चक्कर तोड़े जा सकते हैं। प्राणशक्ति शेष है, शेष!’

तुरन्त ही लगा कि श्यामला के सामने फ़िजूल अपना रहस्य खोल दिया, व्यर्थ ही आत्म-स्वीकार कर डाला। कोई भी व्यक्ति इतना परम प्रिय नहीं हो सकता कि भीतर का नंगा, बालदार रीछ उसे बताया जाए! मैं असीम दुख के खारे मृतक सागर में डूब गया।

श्यामला अपनी जगह से धीरे से उठी, साड़ी का पल्ला ठीक किया, उसकी सलवटें बराबर जमाईं, बालों पर से हाथ फेरा। और फिर (अँगरेज़ी में) कहा, ‘सुन्दर कथा है, बहुत सुन्दर!’

फिर, वह क्षण-भर खोई-सी खड़ी रही, और फिर बोली,‘तुमने कहाँ पढ़ी?’ मैं अपने ही शून्य में खोया हुआ था। उसी शून्य के बीच में से मैंने कहा, ‘पता नहीं…किसी ने सुनाई या मैंने कहीं पढ़ी।’

और, वह श्यामला अचानक मेरे सामने आ गई, कुछ कहना चाहने लगी, मानो उस कहानी में उसकी किसी बात की ताईद होती हो।

उसके चेहरे पर धूप पड़ी हुई थी। मुखमंडल सुन्दर और प्रदीप्त दिखाई दे रहा था।

कि इसी बीच हमारी आँखें सामने के रास्ते पर जम गईं।

घुटनों तक मैली धोती और काली, नीली, सफ़ेद या लाल बंडी पहने कुछ देहाती भाई, समूह में, चले जा रहे थे। एक के हाथ में एक बड़ा-सा डंडा था, जिसे वह अपने आगे, सामने, किए हुए था। उस डंडे पर एक लम्बा मरा हुआ साँप झूल रहा था। काला भुजंग, जिसके पेट की हलकी सफ़ेदी भी झलक रही थी।

श्यामला ने देखते ही पूछा, ‘कौन-सा साँप है यह?’

वह ग्रामीण मुख, छत्तीसगढ़ी लहजे में चिल्लाया, ‘करेट है बाई, करेट!’

श्यामला के मुँह से निकल पड़ा, ‘ओफ़्फो! करेट तो बड़ा जहरीला साँप होता है।’

फिर, मेरी ओर देखकर, कहा, ‘नाग की तो दवा भी निकली है, करेट की तो कोई दवा नहीं है। अच्छा किया, मार डाला। जहाँ साँप देखो, मार डालो; फिर वह पनियल साँप ही क्यों न हो।’

और फिर, न जाने क्यों, मेरे मन में उसका यह वाक्य गूँज उठा, ‘जहाँ साँप देखो, मार डालो।’

और ये शब्द मेरे मन में गूँजते ही चले गए।

कि इसी बीच…रजिस्टर में चढ़े हुए आँकड़ों की एक लम्बी मीज़ान मेरे सामने झूल उठी, और गलियारे के अँधेरे कोनों में गरम होनेवाली मुट्ठियों का चोर-हाथ।

श्यामला ने पलटकर कहा, ‘तुम्हारे कमरे में भी तो साँप घुस आया था। कहाँ से आया था वह?’

फिर उसने ख़ुद ही जवाब दे लिया, ‘हाँ, वह पास की खिड़की में से आया होगा।’

खिड़की की बात सुनते ही मेरे सामने, बाहर की काँटेदार बेंत की झाड़ी आ गई, जिसे जंगली बेल ने लपेटकर रखा था। मेरे ख़ुद के तीखे काँटों के बावज़ूद, क्या श्यामला मुझे इसी तरह लपेट सकेगी! बड़ा ही ‘रोमैंटिक’ ख़याल है, लेकिन कितना भयानक!

…क्योंकि श्यामला के साथ अगर मुझे ज़िन्दगी बसर करनी है तो न मालूम कितने ही भगवे खद्दर-कुरतेवालों से मुझे लड़ना पड़ेगा, जी कड़ा करके लड़ाइयाँ मोल लेनी पड़ेंगी और अपनी आमदनी के ज़रिए ख़त्म कर देने होंगे। श्यामला का क्या है! वह तो एक गाँधीवादी कार्यकर्ता की लड़की है, आदिवासियों की एक संस्था में कार्य करती है। उसका आदर्शवाद भी भोले-भाले आदिवासियों की उस कुल्हाड़ीजैसा है जो जंगल में अपने बेईमान और बेवफ़ा साथी का सिर धड़ से अलग कर देती है। बारीक बेईमानियों का सूफ़ियाना अन्दाज़ उसमें कहाँ!

किन्तु, फिर भी आदिवासियों–जैसे उस अमिश्रित आदर्शवाद में मुझे आत्मा का गौरव दिखाई देता है, मनुष्य की महिमा दिखाई देती है, पैने तर्क की अपनी अन्तिम प्रभावोत्पादक परिणति का उल्लास दिखाई देता है–और ये सब बातें मेरे हृदय को स्पर्श कर जाती हैं। तो अब मैं इसके लिए क्या करूँ, क्या करूँ!

और अब मुझे सज्जायुक्त भद्रता के मनोहर वातावरण वाला अपना कमरा याद आता है…अपना अकेला धुँधला-धुँधला कमरा। उसके एकान्त में प्रत्यावर्तित और पुन: प्रत्यावर्तित प्रकाश के कोमल वातावरण में मूल-रश्मियों और उनके उद्गम-स्रोतों पर सोचते रहना, ख़यालों की लहरों में बहते रहना कितना सरल, सुन्दर और भद्रता-पूर्ण है। उससे न कभी गरमी लगती है, न पसीना आता है, न कभी कपड़े मैले होते हैं। किन्तु प्रकाश के उद्गम के सामने रहना, उसका सामना करना, उसकी चिलचिलाती दोपहर में रास्ता नापते रहना और धूल फाँकते रहना कितना त्रासदायक है! पसीने से तरबतर कपड़े इस तरह चिपचिपाते हैं और इस क़दर गन्दे मालूम होते हैं कि लगता है…कि अगर कोई इस हालत में हमें देख ले तो वह बेशक हमें निचले दर्जे का आदमी समझेगा। सजे हुए टेबल पर रखे कीमती फाउंटेन पेन-जैसे नीरव-शब्दांकनवादी हमारे व्यक्तित्च, जो बहुत बड़े ही खुशनुमा मालूम होते हैं–किन्हीं महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों के कारण–जब वे आँगन में और घर-बाहर चलती हुई झाड़ू–जैसे काम करनेवाले दिखाई दें, तो इस हालत में वे यदि सड़क-छाप समझे जाएँ तो इसमें आश्चर्य ही क्या है!

लेकिन, मैं अब ऐसे कामों की शर्म नहीं करूँगा, क्योंकि जहाँ मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्य है!

(सम्भावित रचनाकाल 1959 के बाद। कल्पना, दिसम्बर 1963 में प्रकाशित)

राजनीति का बंटवारा (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई

Rajniti ka Batwara – Harishankar Parsai ke vyangya

राजनीति का बँटवारा

सेठजी का परिवार सलाह करने बैठा है। समस्या राष्ट्रीय है। आखिर इस राष्ट्र का होगा क्या?

नगर निगम के चुनाव होने वाले थे और समस्या यह थी कि किस पार्टी के हाथ में निगम जाता है।

सेठजी का परिवार कई करोड़ वाला है। सब देशभक्त हैं। परिवार के वयोवृद्ध भैयाजी पाँच साल स्वाधीनता-संग्राम में जेल हो आए थे। वे ‘राष्ट्रपिता’ बनना चाहते थे, पर गांधीजी ने उन्हें नहीं बनने दिया। इस कारण वे गांधीजी से नाराज हो गए हैं। कहते हैं, “एक बनिए ने दूसरे बनिए को राष्ट्रपिता नहीं बनने दिया। खैर, चौराहे पर मेरी मूर्ति की स्थापना तो हो ही रही है।”

अब कई एजेंसियाँ परिवार ने ले रखी हैं। कई चीजों के स्टाकिस्ट हैं। इस कारण देशभक्ति और बढ़ गई है। आखिर देश के धन की रक्षा भी तो करनी है। राष्ट्र-प्रेम में कमी नहीं है। पर बिजनेस की भी एक नैतिकता होती है। यह नैतिकता है—चुंगी चोरी, स्टाक दबाना, मुनाफाखोरी करना, ब्लैक से देश का माल बेचना। अभी चन्दा करके वयोवृद्ध देशभक्त भैयाजी ने शहीदों की स्मृति में कई लाख का ‘बलिदान मन्दिर’ बनवाया है, जिसमें से काफी चन्दा खा गए। लोगों ने शक की आवाज उठाई तो भैयाजी ने कहा, “हर धन्धे में कमीशन मिलता है। जब शहीदों ने खून दिया तो मैंने, जिसने खून नहीं दिया, यदि चन्दे में से कमीशन नहीं खाया, तो स्वर्ग में शहीदों की आत्मा को कितना कष्ट होगा? वे तो मर गए। पर मैं जीवित हूँ। तो ‘अमर शहीद’ तो मैं ही हुआ न! वे तो ‘अमर शहीद’ नहीं हुए।”

तो परिवार राष्ट्रीय समस्या पर विचार कर रहा है : किस पार्टी का निगम बनेगा? चुंगी की चोरी कैसे होगी?

भैया जी बड़े होशियार हैं। जब आखिरी बार जेल जाने लगे तो छोटे भाई से कह गए, “दस हजार रुपया अंग्रेज कलेक्टर को ब्रिटिश वार फंड में दे देना। बहुत करके इस लड़ाई के खत्म होते-होते स्वराज्य मिल जाएगा। तब मैं तो हूँ ही। पर मान लो, अंग्रेज कुछ साल नहीं गए, तो तुम्हारे नाम की ‘वार फंड’ की रसीद है ही। दोनों पक्ष सँभालना चाहिए। स्वराज्य हुआ तो मैं—अंग्रेज रहे तो तुम!”

भैयाजी फिर बोले, “यदि नगर निगम कांग्रेस के हाथ में आया तो मैं तो हूँ ही। मैं अपने त्याग और वयोवृद्ध सम्मान से चुंगी-चोरी प्रतिष्ठापूर्वक करवा दूँगा। वैसे यह घोर अन्तर्राष्ट्रीय कर्म है कि जो जेल गए, वहाँ ‘सी’ में नहीं ‘ए’ क्लास में रहे, उनके परिवार के माल पर चुंगी लगे। यह राष्ट्र-विरोधी आचरण है। मैं संसद में इस सवाल को उठवाऊँगा। इन ‘सी’ क्लासियों की हरकत नहीं चलने पाएगी।”

एक भतीजा पढ़ा-लिखा था। जवान था। राजनीति में वंश-परम्परा के प्रतिकूल एम.ए. करके शोध कर रहा था। वाचाल था।

कहने लगा, “पर काकाजी, जेल में ‘ए’ क्लास में मजे-ही-मजे हैं। जो भी ‘ए’ क्लास में गए, उनमें से कई ने किताबें लिखीं। आपने भी तो हजारों पृष्ठ लिखे थे!”

भैयाजी विनम्रता से बोले, “मैं तो निमित्त हूँ। देवी सरस्वती ने लिखवाया, तो मैंने लिख दिया।”

भतीजे ने कहा, “पर काकाजी, लोग कहते हैं कि यह सब आपने नहीं लिखा। किसी से लिखवाया है।”

भैयाजी ने कहा, “बेटा, किसी कवि ने कहा है :

कारागार-निवास स्वयं ही काव्य है,

कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है।”

यह भतीजा परिवार में विद्रोही माना जाता है। कहता है, “मैं इस धन और प्रतिष्ठा के मलबे के नीचे दबकर नहीं मरूँगा। मैं शोध करके नौकरी करूँगा। पर जब लोग यह कहते हैं कि आपने नहीं लिखा, दूसरे से लिखवाया है तो मुझे बड़ी शर्म आती है।”

भैयाजी ने कहा, “तू जवाब दे दिया कर।”

लड़के ने कहा, “जवाब तो मैं दे लेता हूँ। मैं कह देता हूँ—मैं निश्चित रूप से कह देता हूँ कि यह आपने ही लिखा है; क्योंकि हिन्दी में इतना घटिया लिखने की प्रतिभा किसी और में नहीं है।”

भैयाजी लाल हो गए। छोटे भाई से कहा, “तुम्हारा लड़का नक्सलवादी हो गया है। वही लोग बुजुर्गों से ऐसी बदतमीजी करते हैं। इस लड़के को कहीं दूर होस्टल में रखो।”

तीसरे भाई ने कहा, “भाईजी, पर राष्ट्रीय समस्या तो छूटी जा रही है। चुंगी-चोरी कैसे होगी? अभी तो हम निगम की सीमा के बाहर डिपो बनाए हुए हैं और रात को चोरी से स्टाक ले आते हैं। कुछ खिला-पिला देते हैं। दारू की एक बोतल में नाके का मुंशी मान जाता है। वह बेहोश हो जाता है और हम काम कर लेते हैं।”

भैयाजी ने कहा, “यह मार्ग उचित नहीं है। गांधीजी ने सत्य पर जोर दिया है। जो हो, सत्य के मार्ग से हो। दिन में हो, उजाले में हो। यदि कांग्रेस का कब्जा निगम पर हो गया तो मैं तो हूँ ही। सत्य के मार्ग पर ही चलूँगा।”

बड़े भतीजे ने, जिसने परिवार की नैतिकता मान ली थी, कहा, “पर यदि जनसंघ का कब्जा हो गया, तो?”

भैयाजी बोले, “जनसंघ से मेरी पट जाती है। वे भी गौ-भक्त, मैं भी गौ-भक्त। पिछली बार जब मैंने गौ-रक्षा के लिए अनशन किया था तो उन्होंने मेरे खिलाफ उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था। वे भी हिन्दी-प्रेमी, मैं भी। वे भी राष्ट्रीय, मैं भी राष्ट्रीय। उनका निगम हो गया, तो गांधीजी के सत्य के अनुसार मैं दिन में ही ट्रक बुलवा दूँगा।”

वही वाचाल युवक भतीजा बोला। भैयाजी गुस्से से देखने लगे। उसने कहा, “पर कहीं ये कम्युनिस्ट जोड़-तोड़ करके निगम पर हावी हो गए तो?”

भैया साब गर्म हो गए, “ये कम्युनिस्ट? गद्‌दार, साले हरामजादों को देख लूँगा। सबको जेल भेज दूँगा।”

वाचाल भतीजा, जो मलबे के नीचे दबकर नहीं मरना चाहता था, बोल उठा, “काकाजी, गांधीजी ने बार-बार कहा था कि कटु मत खोलो। मीठा बोलो। आप गांधीवादी हैं, पर ‘साले’ और ‘हरामजादे’ शब्दों का प्रयोग करते हैं।”

भैयाजी ने कहा, “तू बच्चा है। गांधीजी ने वह बात पंडित नेहरू और सरदार पटेल के लिए कही थी कि मीठी बातें आपस में किया करो। हम लोगों के लिए नहीं कही थी। हम लोग तो अपने विरोधी की माँ-बहन पर भी उतर सकते हैं। गांधी-मार्ग बड़ा विराट मार्ग है। ये कम्युनिस्ट देशद्रोही हैं।”

वाचाल लड़का चुप नहीं रहा। बोला, “काकाजी, ये कम्युनिस्ट जब रूस, चेकोस्लोवाकिया, क्यूबा वगैरह में देशद्रोही नहीं हैं, तो अपने देश में ही देशद्रोही क्यों हैं?”

भैयाजी ने कहा, “यह इस देश की विशिष्ट संस्कृति के कारण है।”

लड़का बोला, “तो काकाजी, अपनी देशद्रोह की संस्कृति है?”

अब भैयाजी को बरदाश्त नहीं हुआ। उन्होंने लड़के को डाँटा, “तू मूर्ख है। इसी वक्त यहाँ से उठ और कमरे में जाकर उस कचरे को पढ़ जिसे तू ‘पोलिटिकल साइंस’ कहता है। हमने भी जीवन-भर राजनीति की है। चालीस साल हो गए, पर राजनीति को हमने कभी विज्ञान नहीं, ‘कला’ कहा। फिर आजादी के बाद राजनीति को कलाबाजी कहने लगे। अब तू इसी उम्र में राजनीति को विज्ञान कहने लगा? जा, भाग यहाँ से!”

अब राष्ट्रीय समस्या आगे बढ़ी।

एक भाई ने कहा, “यदि निगम पर सोशलिस्ट पार्टी का कब्जा हो गया तो?”

भैयाजी ने कहा, “ये समाजवादी हुल्लड़ करते हैं। मैं निगम भंग करवा दूँगा।”

भाई ने कहा, “मान लो, भंग नहीं हुई तो?”

भैयाजी ने कहा, “मैं सोचता हूँ।”

बड़े भतीजे ने कहा, “मान लो, चीन ने हमला करके निगम कर कब्जा कर लिया तो?”

भैयाजी ने कहा, “मुझे सोचने दो।”

तभी भाई ने कहा, “मान लो, संगठन कांग्रेस का शासन हो गया तो?”

भैयाजी ने कहा, “उसकी चिन्ता मत करो। आखिर मैं भी तो संगठन कांग्रेसी ही हूँ। यह अलग बात है कि इंदिरा गांधी के वोट खींचने की ताकत के कारण इधर हूँ और समाजवाद में विश्वास बतलाता हूँ।”

सारी राष्ट्रीय समस्याएँ सामने आ गईं।

अब वयोवृद्ध देशभक्त आँखें बन्द करके चिन्तन में लग गए।

फिर आँखें खोलीं। आँखों में दैवी ज्योति थी।

भैयाजी ने कहा, “मेरी पवित्र आत्मा से समस्या का समाधान निकल आया। तुममें से हर एक एक-एक पार्टी के सदस्य हो जाओ।”

“मैं कांग्रेस में हूँ और संगठन कांग्रेस में भी।”

“तुम छोटे, जनसंघ के सदस्य हो जाओ।”

फिर बड़े भतीजे से कहा, “तुम समाजवादी पार्टी के सदस्य हो जाओ।”

फिर छोटे भतीजे से कहा, “तुम कम्युनिस्ट हो जाओ।”

सबसे छोटे भाई से कहा, “तुम मार्क्सवादी पार्टी में शामिल हो जाओ। और वह बिगड़ा लौंडा जो है, वह नक्सलवादी हो ही गया है।”

परिवार ने सन्तोष की साँस ली।

भैयाजी खुश थे। कहने लगे, “देखा तुमने? राजनीतिक ज्ञान इसे कहते हैं। अब अपने घर में सब पार्टियाँ हो गईं। किसी का भी नगर निगम हो, चुंगी-चोरी पक्की। हमने सारी पार्टियों को तिजोरी में बन्द कर लिया है।”

धोबिन को नहिं दीन्हीं चदरिया (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई

Dhobin ko nhi Dinhi Chadriya ~ Harishankar Parsai ke Vyangya

पता नहीं, क्यों भक्तों की चादर मैली होती है! जितना बड़ा भक्त, उतनी ही मैली चादर। शायद कबीरदास की तरह ‘जतन’ से ओढ़कर चदरिया को ‘जस की तस’ धर देते हैं :

दास कबीर जतन से ओढ़ी

धोबिन को नहिं दीन्हीं चदरिया!

अभी जो भक्त किस्म के वयोवृद्ध मेरे पास आए थे, उनकी चादर भी बेहद मैली थी। उनसे मेरा दो-चार बार का परिचय था। अचानक वे आ गए। मुझे अटपटा लगा—ये मेरे पास क्यों आ गए?

मुझे उनके परिचितों ने बताया था कि ये पहले सरकारी नौकरी में थे। ड्‌यूटी पर दुर्घटना में इनको चोट पहुँची। विभाग ने इलाज करवाया और छह हजार रुपया हरजाना दिया। अब ये रिटायर हो गए हैं। लाख रुपये से कम सम्पत्ति नहीं है। जमीन भी है। मकान है। एक किराये पर है। पेंशन भी मिलती है। घर में दो प्राणी हैं—पति-पत्नी। कोई कष्ट नहीं है। भजन-पूजन में लगे रहते हैं। भगवान से लौ लगी है। आदमी तुच्छ हैं। पड़ोस में कोई मर रहा हो तो देखने भी नहीं जाएँगे। बड़े शान्तिमय, निर्मल आदमी हैं, क्योंकि लौ दुनिया से नहीं, परमेश्वर से लगी है।

घर में खाने-पीने का सुभीता हो, जिम्मेदारी न हो, तो सन्त और भक्त होने में सुभीता होता है। अभी साईं बाबा की मृत्यु की वर्षगाँठ पर सात दिनों तक यहाँ समारोह हुआ। दिन-रात चौबीसों घंटे लगातार लाउडस्पीकर पर ऊँचे स्वर पर भजन और ‘जै’ होती रही थी। मोहल्ले के छात्र-छात्राएँ पीड़ित। बीमार लोग मौत का इन्तजार करते थे। दिन-रात कोलाहल। पढ़ें कब? नींद कब आए?

साईं बाबा मानव-कल्याण के आकांक्षी थे। उनकी आत्मा स्वर्ग में बहुत तड़प रही होगी।

हजारों—यानी पचास-साठ हजार तो खर्च हुए ही होंगे। ये आए कहाँ से, पूछना फालतू है। अन्तिम दिन भंडारे में ही तीन हजार लोगों ने भोजन किया होगा। यह सब चन्दे का पैसा। एक भजन बार-बार बजता :

दर्शन दे दे अम्बे मैया

जियरा दर्शन को तड़पे।

मैंने सोचा, इसे ऐसा भी गा सकते हैं :

दर्शन दे दे चन्दा मैया

जियरा खाने को तड़पे।

मैं एक दिन गया, यह देखने कि इस पतित समाज में ऐसे भक्त कौन हो गए हैं। पर मुझे जो कुछ प्रमुख ‘साईं-भक्त’ मिले, वे महान थे। किसी पर गबन का मुकदमा चल रहा है। कोई सस्पेंड अफसर है। किसी की विभागीय जाँच हो रही है। मुनाफाखोर, मिलावटी। आदमी का खून उसके ‘कल्याण’ के लिए चूसने वाले। अफसरों को घूस खिलाने का धन्धा करने वाले। पीले पत्रकार। राजनीति में वनवास भोगने वाले आधुनिक ‘राम’ जो दशरथ की आज्ञा से नहीं, जनता के खदेड़ देने से वनवास भुगत रहे हैं। फिर वे लोग जिनका धन्धा ही है चन्दा उगाहना किसी बहाने से और उसे पेट में डाल लेना।

मैंने सोचा—एक मैं पापी और इतने ये भक्त! मैं भक्तों के सामने से झेंपकर भाग आया।

फिर सोचा—साईं बाबा जीवित होते और ये उनके पास जाते। वे सन्त थे, ज्ञानी थे, अन्तर के रहस्य को, चरित्र को समझ लेते थे। वे इन्हें समझ लेते। ये आशीर्वाद माँगते, तो साईं बाबा कहते, ‘परम पापी, देह के लिए बहुत कर चुके। अब देह-त्याग करो और नर्क के लिए बिस्तर बाँधो। वहाँ रिजर्वेशन मैं करा देता हूँ।’

तो मुझे भक्त से बड़ा डर लगता है। पर ये भक्त घर में आ गए। कबीर की ‘धोबिन को नहिं दीन्हीं चदरिया’ की गन्ध लेकर।

बैठते ही ‘रामधुन’ गाने लगे। फिर कहने लगे, “आप तो स्वयं ज्ञानी हैं। ब्रह्म ही सत्य है। जगत मिथ्या है। माया शत्रु है। किसी को माया के जाल में नहीं फँसाना चाहिए। मैंने माया त्याग दी है। अब बस, प्रभु हैं और मैं हूँ। लोभ, मोह, स्वार्थ—सबसे मुक्त।”

फिर वे ‘हरे राम, हरे कृष्ण’ गाने लगे।

मुझे परेशानी तो हुई, पर अच्छा भी लगा कि एक विरागी भक्त की चरण-रज मेरे घर में पड़ रही है।

मैंने उन्हें भोजन कराया। बड़ी रुचि से उन्होंने इस असार देह में काफी भोजन डाला।

फिर सो गए।

शाम को बात शुरू हुई।

भजन और हरि-स्मरण स्थगित हो गया। बीच-बीच में वे ‘हे राम’ कह लेते थे।

कहने लगे, “ड्‌यूटी पर घायल होने का मुआवजा मुझे सिर्फ छह हजार रुपए दिया गया।”

मैं चौंका—माया सन्त के भीतर से कैसे निकल पड़ी? कहाँ छिपी थी? दिनभर ये माया को कोसते रहे और अब छह हजार के मुआवजे की बात कर रहे हैं! माया सचमुच बड़ी ठगनी होती है।

फिर बोले, “मैंने पन्द्रह हजार का मुकदमा दायर किया था, पर अभी मैं हाई कोर्ट से केस हार गया।”

फिर उन्होंने एक कागज निकाला। बोले, “यह मैंने राष्ट्रपति को पत्र लिखा है। इसे देखिए।”

मैंने पत्र पढ़ा। तमाम अनर्गल बातें थीं। मुख्य बात जो लिखी थी, वह यह थी, ‘मैं ईश्वरभक्त हूँ। मनुष्य मेरे साथ न्याय नहीं कर सकता। मैं पन्द्रह हजार रुपए चाहता था, पर हाई कोर्ट ने मेरी माँग नामंजूर कर दी। जज लोग भी मनुष्य होते हैं। राष्ट्रपति महोदय, मेरा बयान ब्रह्मा, विष्णु, महेश के सामने होगा। अब इसका प्रबन्ध कीजिए।’

मैंने कहा, “जब माया आपने त्याग दी है, तो इतनी माया आप और क्यों चाहते हैं?”

उनका जवाब था, “मैंने माया त्याग दी, पर माया मुझे फँसाए है। वह कहती है—पन्द्रह हजार लो।”

मैंने कहा, “आप खुद माया के फन्दे में पड़ रहे हैं। इसे काट डालो निर्लोभ के चाकू से।”

वे कहने लगे, “कुछ भी हो, मैं राष्ट्रपति से न्याय करवाऊँगा। ब्रह्मा, विष्णु, महेश न्यायाधीश होंगे। तीनों को राष्ट्रपति बुलाएँ। मैं अपना केस उनके सामने ही रखूँगा।”

मैंने कहा, “पृथ्वी और स्वर्ग में डाक-तार सम्बन्ध अभी नहीं है। राष्ट्रपति ब्रह्मा, विष्णु, महेश को ‘सम्मन’ कैसे भेजेंगे? वे देव यहाँ नहीं आ सकते। एक ही रास्ता है।”

वे बोले, “क्या?”

मैंने कहा, “आपको साथ लेकर राष्ट्रपति स्वर्ग जाएँ और ब्रह्मा, विष्णु, महेश के सामने आपका केस रखें।”

वे बोले, “मुझे भी जाना पड़ेगा?”

मैंने कहा, “हाँ। फिर वहाँ से कोई वापस नहीं लौटता। फिर पन्द्रह हजार का ‘क्लेम’ मान भी लिया गया तो ‘पेमेंट’ पृथ्वी पर होगा या वहाँ होगा? पुनर्जन्म अगर होता हो तो कोई कुत्ता, कोई सूअर बना दिया जाता है। कोई ठिकाना है, आप क्या बना दिए जाएँ! तब वे पन्द्रह हजार किस काम के?”

वे कहने लगे, “यानी मुझे भी जाना पड़ेगा?” (घबराहट)

मैंने कहा, “हाँ, वरना बयान कौन देगा? फिर स्वर्ग में सुख-ही-सुख है। आप तो विरागी हैं! वहीं रहिए।”

वे चिन्तित हुए। भजन बन्द हो गए। ‘हरे राम, हरे कृष्ण’ बन्द। कहने लगे, “बात यह है कि इस पृथ्वी पर कुछ साल रहना है। कुछ काम भी करने हैं। देह छोड़ने की इच्छा नहीं है।”

मैंने कहा, “बहुत रह लिये। देह तो पाप की खान है। पाप छूट जाए तो क्या हर्ज है? पर एक बात है।”

उन्होंने पूछा, “क्या?”

मैंने कहा, “राष्ट्रपति आपके साथ ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पास नहीं जाएँगे। मैं भी नहीं चाहता। कोई भी नहीं चाहता। आपको अकेले ही जाना होगा। राष्ट्रपति चिट्‌ठी शायद लिख दें।”

वे बोले, “मेरा खयाल था कि मेरी इस चिट्‌ठी से राष्ट्रपति का दिल पिघल जाएगा और वे बाकी नौ हजार मुझे दिलवा देंगे। मेरा आग्रह यह नहीं है कि वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पास जाएँ। बस, नौ हजार और दिलवा दें।”

मैंने कहा, “इस चिट्‌ठी को राष्ट्रपति का सचिव फाड़कर फेंक देगा और कलेक्टर को सूचित करेगा कि इस आदमी का दिमाग खराब हो गया है। इस पर निगरानी रखी जाए। कहीं कोई अपराध न कर बैठे।”

वे घबराए। कहने लगे, “अरे बाप रे, ऐसा होगा? मेरे पीछे पुलिस पड़ जाएगी?”

मैंने कहा, “ऐसा ही होता है। कानून है।”

भक्ति उतर गई। परमेश्वर उनके अपरिचित हो गए। ब्रह्मा, विष्णु, महेश कोई हैं, यह वे भूल चुके थे।

मेरा खयाल था, ये अध्यात्म में चले गए हैं और इनका दिमाग भी गड़बड़ हो गया है।

पर मेरा अन्दाज गलत था। वे सामान्य ही थे।

उन्होंने कहा, “तो यह पत्र राष्ट्रपति को न भेजूँ?”

मैंने कहा, “कतई नहीं।”

वे बोले, “आप कहते हैं, तो न भेजूँगा। पर आपसे बात करनी है। बहुत प्राइवेट है।”

भजन बन्द। राम, कृष्ण कोई नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश को वे भूल चुके थे। नर्क में भी हों तो कोई मतलब नहीं। मैंने कहा, “कमरे में मैं और आप दोनों हैं। जो बात करनी है, बेखटके करें।”

अब उनका ईश्वर कहीं खो गया था। मिल नहीं रहा था। नौ हजार चेतना में ईश्वर की खाली ‘सीट’ पर बैठ गया था।

वे भक्त जरूर रहे, पर चादर में से बदबू कम आने लगी थी।

कहने लगे, “अब तो यह मामला दिल्ली में ही तय होगा। आप दिल्ली जाते ही रहते हैं। कई संसद-सदस्यों से आपके अच्छे सम्बन्ध हैं। सुना है, मंत्रियों से भी आपके सम्बन्ध हैं। आप कोशिश करें तो मामला तय हो सकता है। मुझे बाकी नौ हजार मिल सकते हैं।”

मैंने कहा, “मैं कोशिश करूँगा, जरूर कहूँगा कि आपका नौ हजार, जिसे आप अपना ‘क्लेम’ कहते हैं, आपको मिल जाए।”

वे कहने लगे, “बस, मुझे सिर्फ आपका भरोसा है। इसीलिए मैं आया था। मैं ईश्वर को और आपको—दो को मानता हूँ। आप भी करुणासागर हैं।”

चादर की बदबू और कम हो गई थी।

मैंने कहा, “मगर आपके परम हितैषी ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुछ नहीं कर पाएँगे नौ हजार दिलवाने में?”

वे बोले, “उसे छोड़िए। आप ही मेरे ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं। आप ही यह काम करवाइए।”

चन्दन पुँछ गया था।

जो हर क्षण ईश्वर का नाम लेते थे, वे अब एक बार भी ईश्वर की याद नहीं कर रहे थे।

कहने लगे, “बस, मामला मैंने आप पर छोड़ दिया। आपके बड़े-बड़े ‘सोर्स’ हैं। आप यह काम करवा ही देंगे। अब मेरी गाड़ी का समय हो रहा है। मैं चलता हूँ।”

मैंने पूछा, “भोजन?”

वे बोले, “भोजन तो मैं स्वास्थ्य के खयाल से एक ही बार करता हूँ।”

मैंने भानजे से कहा, “इनके लिए स्टेशन तक का रिक्शा करा दो। रिक्शे वाले को किराया तुम ही देना।”

वे बोले, “अरे, आप कैसी बात करते हैं? आप रिक्शे का किराया देंगे?”

मैंने कहा, “हाँ, आप मेरे घर आए। कृपा की। आप मेरे मेहमान हैं। मेरा कर्तव्य है यह।”

रिक्शे में बैठे थे। भानजे से कहा, “बेटा, तुम जरा यहाँ से चले जाओ।”

भानजा चला गया।

तब उन्होंने मेरे कान में कहा, “अगर आपने नौ हजार दिलवा दिये, तो तीन हजार मैं आपको दे दूँगा। वन थर्ड।”

मुझे बिजली का झटका लगा। इनके मन में मेरी क्या छवि है!

भक्ति, सन्तत्व, निर्लोभ, मायाहीनता, विराग, मिथ्या जीवन से हम कहाँ तक आ गए थे!

मैंने उन्हें जवाब नहीं दिया।

रिक्शे वाले से कहा, “तुम्हें किराया मिल गया। गाड़ी का टाइम हो रहा है। फौरन स्टेशन पहुँचाओ।”

मैंने उनकी ‘नमस्कार’ का जवाब भी नहीं दिया। मुझे होश नहीं था। फिर कमरे में बैठकर सोचता रहा कि ये भक्त, सन्त मुझे कैसा समझते हैं?

ये मुझे नहीं, जमाने के चरित्र को समझते हैं।

चदरिया गन्दी ओढ़ते हैं।

जस-की-तस रखना चाहते हैं। जीवन-भर वही चदरिया, उसी ढंग से ओढ़ गए। पर जाते वक्त बदबू काफी कम थी :

दास कबीर जतन से ओढ़ी

धोबिन को नहिं दीन्हीं चदरिया!

सबसे खतरनाक होता है (कविता) : अवतार सिंह संधू ‘पाश’

 

Sabse Khatarnak hota hai kavita by Avtar Singh Sandhu ‘Pash’

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती
 
बैठे-बिठाए पकड़े जाना, बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना, बुरा तो है
पर सबसे खतरनाक नहीं होता
 
कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना, बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना, बुरा तो है
मुट्ठियां भींचकर बस वक्त निकाल लेना, बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता
 
सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
 
सबसे खतरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नजर में रुकी होती है
सबसे खतरनाक वो आंख होती है
जो सबकुछ देखती हुई जमी बर्फ होती है
जिसकी नजर दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीजों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है
जो रोजमर्रा के क्रम को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दोहराव के उलटफेर में खो जाती है
 
सबसे खतरनाक वो चांद होता है
जो हर क़त्ल, हर कांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं गड़ता है
 
सबसे खतरनाक वो गीत होता है
आपके कानों तक पहुंचने के लिए
जो मरसिए पढ़ता है
आतंकित लोगों के दरवाजों पर
जो गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे खतरनाक वह रात होती है
जो ज़िंदा रूह के आसमानों पर ढलती है
जिसमें सिर्फ उल्लू बोलते और हुआं हुआं करते गीदड़
हमेशा के अंधेरे बंद दरवाजों-चौखटों पर चिपक जाते हैं
 
सबसे खतरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए
 
मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती
 
अवतार सिंह संधू ‘पाश
 
 
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रावी पार (कहानी) – गुलज़ार | Ravi paar : Gulzaar ki Kahani

Ravi paar : Gulzaar ki Kahani

पता नहीं दर्शन सिंह क्यूं पागल नहीं हो गया? बाप घर पे मर गया और मां उसे बचे-खुचे गुरुद्वारे में खो गई और शाहनी ने एक साथ दो बच्चे जन दिये। दो बेटे, जुड़वां। उसे समझ नहीं आता था कि वह हंसे या रोये! इस हाथ ले, इस हाथ दे का सौदा किया था किस्मत ने।

सुनते थे आज़ादी आ चुकी है या आ रही है, टोडरमलपुर कब पहुंचेगी, पता नहीं चलता था। हिन्दू, सिख सब छुपते-छुपते गुरुद्वारे में जमा हो रहे थे। शाहनी दिन रात दर्द से कराहती रहती थी। आख़री दिन थे जचकी के, और पहली-पहली औलाद।

दर्शन सिंह रोज़ नई-नई ख़बरे लाता था, फ़सादात की। बाप ढाढस देता।

“कुछ नहीं होगा बेटा, कुछ नहीं होगा। अभी तक किसी हिन्दू-सिख के मकान पर हमला हुआ क्या?”

“गुरुद्वारे पर तो हुआ है ना भापाजी। दो बार आग लग चुकी है।”

“और तुम लोग वहीं जाकर जमा होना चाहते हो।”

इस बात पर दर्शन सिंह चुप हो जाता। पर जिसे देखो वही घर छोड़ कर गुरुद्वारे में जमा हो रहा था।

“एक जगह इकट्‌ठा होने से बड़ा हौसला होता है भापाजी। अपनी गली में तो अब कोई हिन्दू या सिख नहीं रह गया। बस हमीं हैं अकेले।”

दस पंद्रह दिन पहले की बात थी, रात के वक़्त भापाजी के गिरने की आवाज़ हुई, आंगन में, और सब उठ गये। दूर गुरुद्वारे की तरफ़ से “बोले सो निहाल” के नारे सुनाई दे रहे थे। भापाजी की उसी से आंख खुल गई थी, और वह छत पर देखने चले गये थे। सीढ़ियाँ उतरते पांव फिसला और बस आंगन में खड़ी कुदाल सिर में घुस गई थी।

किसी तरह भापाजी के संस्कार पूरे किये और कुछ मालियत थी, एक तकिये में भरी, और बाक़ी तीनों ने गुरुद्वारे मे जाकर पनाह ली। गुरुद्वारे में ख़ौफ़जदा लोगों की कमी नहीं थी। इसलिए हौसला रहता था, अब उसे डर नहीं लगता था। दर्शन सिंह कहता—

“हम अकेले थोड़ी ही हैं, और कोई नहीं तो वाहेगुरु के पास तो हैं।”

नौजवान सेवादारों का जत्था दिन भर काम में जुटा रहता। लोगों ने अपने-अपने घरों से जितना भी आटा, दाल, घी था, उठवा लिया था। लंगर दिन रात चलता था। मगर कब तक? यह सवाल सबके दिल में था। लोग उम्मीद करते थे, सरकार कोई कुमक भेजेगी।

“कौन सी सरकार” एक पूछता “अंग्रेज तो चले गये”

“यहाँ पाकिस्तान तो बन गया है लेकिन पाकिस्तान की सरकार नहीं बनी अभी।”

“सुना है मिलेट्री घूम रही है, हर तरफ़ और अपनी हिफ़ाज़त में शर्नार्थियों के काफ़िले बार्डर तक पहुंचा देती है।”

“शरनार्थी? वह क्या होता है?”

“रैफ़्यू-जी”

“यह लफ़ज़ पहले तो कभी नहीं सुने थे”

दो तीन परिवारों का एक जत्था जिनसे दबाव बर्दाश्त नहीं हुआ निकल पड़ा।

“हम तो चलते हैं। स्टेशन पर सुना है, ट्रेनें चल रही हैं। यहाँ भी कब तक बैठे रहेंगे?

“हिम्मत तो करनी पड़ेगी भई! वाहेगुरु मोढ़ों (कधों) पर बिठाकर तो नहीं ले जायेगा न।”

एक और ने गुरुबानी का हवाला दिया।

“नानक नाम जहाज़ है, जो चढ़े सो उतरे पार।”

कुछ लोग निकल जाते तो ख़ला का एक बुलबुला सा बन जाता माहौल में। फिर कोई और आ जाता तो बाहर की ख़बरों से बुलबुला फूट जाता।

“स्टेशन पर तो बहुत बड़ा कैम्प लगा हुआ है जी।”

“लोग भूख़ से भी मर रहे हैं और खा-खा के भी! बीमारी फैलती जा रही है।”

पांच दिन पहले एक ट्रेन गुज़री थी यहां से, तिल रखने को भी जगह नहीं थी। लोग छतों पर लदे हुये थे।”

सुबह संक्रांत की थी। गुरुद्वारे में दिन-रात पाठ चलता रहता था। बड़ी शुभ घड़ी में शाहनी ने अपने जुड़वा बेटों को जन्म दिया। एक तो बहुत ही कमज़ोर पैदा हुआ। बचने की उम्मीद भी नहीं थी लेकिन शाहनी ने नाभी (नाड़ी) के ज़ोर से बांधे रखा उसे।

उसी रात किसी ने कह दिया।

“स्पेशल (Special ) ट्रेन आई है, रेफ़्यूजियों को लेने, निकल चलो।”

एक बड़ा सा हुजूम रवाना हो गया गुरुद्वारे से। दर्शन सिंह भी। शाहनी कमज़ोर थी बहुत लेकिन बेटों के सहारे चलने को तैयार हो गई। माँ ने हिलने से इन्कार कर दिया।

“मैं आजाऊँगी बेटा! अगले किसी काफ़ले के साथ आजाऊँगी। तू बहू और मेरे पोतों को सम्भाल के निकल जा।”

दर्शन सिंह ने बहुत ज़िद की तो ग्रन्थी ने समझाया। सेवादारों ने हिम्मत दी।

“निकल जाओ सरदारजी। एक-एक करके सब बार्डर पार पहुँच जायेंगे। बीजी हमारे साथ आजायेंगी।”

दर्शन सिंह निकल पड़ा सबके साथ। ढक्कन वाली एक बैंत की टोकरी में डाल के बच्चों को यूं सर पे उठा लिया जैसे परिवार का ख़ोंन्चा लेकर निकला हो।

स्टेशन पर गाड़ी थी, लेकिन गाड़ी में जगह नहीं थी। छत पर लोग घास की तरह उगे हुये थे।

बेचारी नई-नई नहीफ़-व-नज़ार मां और नोज़ाइदा बच्चों को देख कर लोगों ने छत पर चढ़ा लिया और जगह दे दी।

क़रीब दस घन्टे बाद गाड़ी में ज़रा सी हरकत हुई। शाम बड़ी सुर्ख़ थी, लहूलहान, तपा हुआ, तमतमाया हुआ चेहरा। शाहनी की छातियाँ निचुड़ के छिलका हो गईं। एक बच्चे को रखती तो दूसरा उठा लेती। मैले कुचैले कपड़ों में लिपटे दो बच्चों की पोटलियाँ, लगता था किसी कूड़े के ढ़ेर से उठा लाये हैं।

कुछ घन्टों बाद जब गाड़ी रात में दाख़िल हुई तो दर्शन सिंह ने देखा, एक बच्चे के हाथ पांव तो हिलते दिखे थे, कभी-कभी रोने की आवाज़ भी होती थी, लेकिन दूसरा बिलकुल साकित था। पोटली में हाथ डालकर देखा तो कब का ठंडा हो चुका था।

दर्शन सिंह जो फूट-फूट के रोया तो आस-पास के लोगों को भी मालूम हो गया। सबने चाहा कि शाहनी से उस बच्चे को लें ले, लेकिन वह तो पहले ही पथरा चुकी थी। टोकरी को झप्पा मार के बैठ गई।

“नहीं, भाई के बग़ैर दूसरा दूध नहीं पीता”

बहुत कोशिश के बावजूद शाहनी ने टोकरी नहीं छोड़ी।

ट्रेन दस बार रुकी, दस बार चली

लोग अंधेरे में अंदाज़े ही लगाते रहते।

“बस जी ख़ैराबाद निकल गया”

“यह तो गुजरांवाला है जी”

बस एक घंटा और। लाहौर आया कि समझो पहुंच गये हिन्दुस्तान।”

जोश में लोग नारे भी लगाने लगे थे

“हर हर महादेव”

“जो बोले सो निहाल”

गाड़ी एक पुल पर चढ़ी, तो लहर सी दौड़ गई

“रावी आ गया जी।”

“रावी है। लाहौर आ गया।”

इस शोर में किसी ने दर्शन सिंह के कान में फुसफुसाकर कहा।

“सरदारजी! बच्चे को यहीं फेंक दो रावी में उसका कल्याण हो जायेगा। उस पार ले जाके क्या करोगे?”

दर्शन सिंह ने धीर से टोकरी दूर खिसका ली। और फिर यकलख़्त ही पोटली उठाई और वाहे गुरु कह कर रावी में फेंक दी।

अन्धेरे में हलकी सी एक आवाज़ सुनाई दी किसी बच्चे की। दर्शन सिंह ने घबराकर देखा शाहनी की तरफ़। मुर्दा बच्चा शाहनी की छाती से लिपटा हुआ था! फिर से एक शोर का बगोला उठा—

“वाघा। वाघा”

“हिन्दुस्तान। ज़िन्दाबाद!!”

ग्रामोफोन पिन का रहस्य – ब्योमकेश बक्शी की जासूसी कहानी

 ब्योमकेश ने सुबह का अखबार अच्छे से तह करके एक ओर रख दिया। उसके बाद अपनी कुरसी पर पीछे सिर टिकाकर खिड़की के बाहर देखने लगा। 

बाहर सूरज चमक रहा था। फरवरी की सुबह थी। न कोहरा, न बादल, आसमान दूर-दूर तक नीला था। हम लोग घर की दूसरी मंजिल में रहते थे। ड्राइंग-रूम की खिड़की से शहर की आपा-धापी और ऊपर खुला आसमान साफ दिखाई देता था। नीचे तरह-तरह के ट्रैफिक की आवाजों से पता चलता था कि शहर रोजाना के शोर-शराबे के लिए जाग रहा है। नीचे हैरीसन रोड का शोरगुल बढ़कर आकाश तक कुलाँचे मारने लग गया था, क्योंकि पक्षियों की चहचहाट आसमान में उड़ने लगी थी। ऊपर दूर तक कबूतरों की कतारें उड़ती दिखाई दीं, लगा, जैसे वे सूरज के इर्द-गिर्द घेरा बनाना चाह रहे हों। सुबह के आठ बजे थे। हम दोनों नाश्ता करके आराम से अखबार के पन्ने उलट रहे थे, इस आस में कि कोई दिलचस्प समाचार दिखाई दे जाए।

ब्योमकेश ने खिड़की से हटने के बाद कहा, ‘‘तुमने वह अजीब विज्ञापन देखा, जो कुछ दिनों से बराबर छप रहा है?’’

मैंने उत्तर दिया, ‘‘नहीं, मैं विज्ञापन नहीं पढ़ता।’’

आश्चर्य से देखते हुए ब्योमकेश बोला, ‘‘तुम विज्ञापन नहीं पढ़ते? तो क्या पढ़ते हो?’’

‘‘जो हरेक व्यक्ति पढ़ता है, समाचार!’’

‘‘दूसरे शब्दों में वो कहानियाँ जैसे मंचूरिया में कोई व्यक्ति है, जिसकी उँगली से खून बहता है या फिर ब्राजील में एक महिला के तीन बच्चे हुए—यही सब पढ़ते हो! क्या फायदा यह पढ़कर? क्यों पढ़ा जाए यह सब? यदि तुम आज के संदर्भ में असली खबर चाहते हो तो विज्ञापन पढ़ो।’’

ब्योमकेश विचित्र व्यक्ति था। यह जल्दी ही पता लग जाएगा। ऊपर से उसे देखकर, उसके चेहरे या बातचीत से कोई यह कह नहीं सकेगा कि उसमें अनेक विशेष गुणों का समावेश है, लेकिन यदि उसे ताना मारो या उसे तर्क में उद्वेलित कर दो तो उसका यह वास्तविक रूप सामने आ जाता है। लेकिन आमतौर पर वह एक गंभीर और कम बोलनेवाला व्यक्ति है। लेकिन जब कभी उसकी खिल्ली उड़ाकर उसका मजाक बनाया जाता है तो उसकी जन्मजात प्रखर बुद्धि सभी संभावनाओं और अवरोधों को तोड़कर उसकी जुबान पर खेलने लग जाती है, तब उसका वार्त्तालाप सुनने लायक हो जाता है।

मैं यही लोभ सँवरण नहीं कर पाया और सोचा कि क्यों न उसे एक बार उद्वेलित करके देखा जाए? मैंने कहा, ‘‘तो यह बात है? इसका मतलब यह हुआ कि अखबारवाले सब बदमाश लोग हैं, जो अखबार के पन्नों को विज्ञापनों से भरने की जगह फिजूल की खबरें छापकर जगह भर देते हैं?’’

ब्योमकेश की आँखों में एक चमक दिखाई देने लगी। वह बोला, ‘‘कसूर उनका नहीं है, क्योंकि वे जानते हैं कि यदि वे तुम्हारे जैसे व्यक्तियों के मनोरंजन के लिए ये फिजूल की कहानियाँ न छापें तो उनका अखबार नहीं बिकेगा। लेकिन वास्तव में चटपटी खबर व्यक्तिगत कॉलमों में मिलती है। यदि तुम सभी प्रकार की महत्त्वपूर्ण खबरें चाहते हो, जैसे कि तुम्हारे इर्द-गिर्द क्या हो रहा है; दिनदहाड़े कौन किसे लूटने की साजिश कर रहा है; स्मगलिंग जैसे गैर-कानूनी काम को बढ़ाने के लिए क्या नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, तो तुम्हें व्यक्तिगत कॉलम के विज्ञापन पढ़ने चाहिए। ‘रायटर्स’ ये सब खबरें नहीं भेजता।’’ मैंने हँसकर जवाब दिया, ‘‘अगर ऐसा है तो आज ही से केवल विज्ञापन ही पढ़ा करूँगा। पर तुमने यह नहीं बताया आज तुम्हें कौन सा विज्ञापन विचित्र लगा?’’

ब्योमकेश ने अखबार मेरी तरफ फेंकते हुए कहा, ‘‘पढ़ लो, मैंने निशान लगा दिया है।’’

क़तील शिफ़ाई की नज़्में

 जीवनी 

जीवनी किसी शायर के शेर लिखने के ढंग आपने बहुत सुने होंगे। उदाहरणतः, ‘इक़बाल’ के बारे में सुना होगा कि वे फ़र्शी हुक़्क़ा भरकर पलंग पर लेट जाते थे और अपने मुंशी को शेर डिक्टेट (लिखाना) कराना शुरू कर देते थे। ‘जोश’ मलीहाबादी सुबह-सवेरे लम्बी सैर को निकल जाते हैं और यों प्राकृतिक दृश्यों से लिखने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। लिखते समय बेतहाशा सिगरेट फूँकने, चाय की केतली गर्म रखने और लिखने के साथ-साथ चाय की चुस्कियाँ लेने के बाद (यहाँ तक कि कुछ शायरों के सम्बन्ध में यह भी सुना होगा कि उनके दिमाग़ की गिरहें शराब के कई पैग पीने के बाद) खुलनी शुरू होती हैं। लेकिन यह अन्दाज़ शायद ही आपने सुना हो कि शायर शे’र लिखने का मूड लाने के लिए सुबह चार बजे उठकर बदन पर तेल की मालिश करता हो और फिर ताबड़तोड़ डंड पेलने के बाद लिखने की मेज़ पर बैठता हो। यदि आपने नहीं सुना तो सूचनार्थ निवेदन है कि यह शायर ‘क़तील’ शिफ़ाई है।

‘क़तील’ शिफ़ाई के शे’र लिखने के इस अन्दाज़ को और उसके लिखे शे’रों को देखकर आश्चर्य होता है कि इस तरह लंगर-लँगोट कसकर लिखे गए शे’रों में कैसे झरनों का-सा संगीत, फूलों की-सी महक और उर्दू की परम्परागत शायरी के महबूब की कमर-जैसी लचक मिलती है। अर्थात् ऐसे वक़्त में जबकि उसके कमरे से ख़म ठोकने और पैंतरे बदलने की आवाज़ आनी चाहिए, वहाँ के वातावरण में कुछ ऐसी गुनगुनाहट बसी होती है :

चौधवीं रात के चाँद की चाँदनी खेतियों पर हमेशा बिखरती रहे

ऊँघते रहगुज़ारों पे फैले हुए हर उजाले की रंगत निखरती रहे

नर्म ख़्वाबों की गंगा बिफरती रहे

या

रात भर बूँदियाँ रक़्स करती रहीं,

भीगी मौसीक़ियों ने सवेरा किया

या

सोई सोई फ़ज़ा आँख मलने लगी,

सेली-सेली हवाओं के पर तुल गए

और इसके साथ यदि आपको यह भी मालूम हो जाए कि ‘क़तील’ शिफ़ाई जाति का पठान है और एक समय तक गेंद-बल्ले, रैकट, लुंगियाँ और कुल्ले बेचता रहा है, चुँगीख़ाने में मुहर्रिरी और बस-कम्पनियों में बुकिंग-क्लर्की करता रहा है तो उसके शे’रों के लोच-लचक को देखकर आप अवश्य कुछ देर के लिए सोचने पर विवश हो जायेंगे। इस पर यदि कभी आपको उसे देखने का अवसर मिल जाए और आपको पहले से मालूम न हो कि वह ‘क़तील’ शिफ़ाई है, तो आज भी आपको वह शायर की अपेक्षा एक ऐसा क्लर्क नज़र आएगा जिसकी सौ-सवा सौ की तनख्वाह के पीछे आधा दर्जन बच्चे जीने का सहारा ढूँढ़ रहे हों। उसका क़द मौज़ूँ है, नैन-नक़्श मौज़ूँ हैं। बाल काले और घुँघराले हैं। गोल चेहरे पर तीखी मूँछें और चमकीली आँखें हैं और वह हमेशा ‘टाई’ या ‘बो’ लगाने का आदी है। फिर भी न जाने क्यों पहली नज़र में वह ऐसा ठेठ पंजाबी नज़र आता है जो अभी-अभी लस्सी के कुहनी-भर लम्बे दो गिलास पीकर डकार लेने के बारे में सोच रहा हो।

पहली नज़र में वह जो भी नज़र आता हो, दो-चार नज़रों या मुलाक़ातों के बाद बड़ी सुन्दर वास्तविकता खुलती है—कि वह डकार लेने के बारे में नहीं, अपनी किसी प्रेमिका के बारे में सोच रहा होता है—उस प्रेमिका के बारे में जो उसे विरह की आग में जलता छोड़ गई, या उस प्रेमिका के बारे में जिसे इन दिनों वह पूजा की सीमा तक प्रेम करता है। प्रेम और पूजा की सीमा तक प्रेम उसने अपनी हर प्रेमिका से किया है और उसकी हर प्रेमिका ने वरदान-स्वरूप उसकी शायरी में निखार और माधुर्य पैदा किया है, जैसे ‘चन्द्रकान्ता’ नाम की एक फ़िल्म ऐक्ट्रेस ने किया है जिससे उसका प्रेम केवल डेढ़ वर्ष तक चल सका और जिसका अन्त बिलकुल नाटकीय और शायर के लिए अत्यन्त दुखदायी सिद्ध हुआ। लेकिन ‘क़तील’ के कथनानुसार :

यदि यह घटना न घटी होती तो शायद अब तक मैं वही परम्परागत ग़ज़लें लिख रहा होता, जिनमें यथार्थ की अपेक्षा बनावट और फ़ैशन होता है। इस घटना ने मुझे यथार्थवाद के मार्ग पर डाल दिया और मैंने व्यक्तिगत घटना को सांसारिक रंग में ढालने का प्रयत्न किया। अतएव उसके बाद जो कुछ भी मैंने लिखा है वह कल्पित कम और वास्तविक अधिक है।

चन्द्रकान्ता से प्रेम और विछोह से पहले ‘क़तील’ शिफ़ाई आर्तनाद क़िस्म की परम्परागत शायरी करता था और ‘शिफ़ा’ कानपुरी नाम के एक शायर से अपने कलाम पर इस्लाह लेता था (इसी सम्बन्ध से वह अपने को ‘शिफ़ाई’ लिखता है)। फिर उसने अहमद नदीम क़ासमी से मैत्रीपूर्ण परामर्श लिये। लेकिन किसी की इस्लाह या परामर्श तब तक किसी शायर के लिए हितकर सिद्ध नहीं हो सकते जब तक कि स्वयं शायर के जीवन में कोई प्रेरक वस्तु न हो। लगन और क्षमता का अपना अलग स्थान है, लेकिन इस दिशा की समस्त क्षमताएँ मौलिक रूप से उस प्रेरणा ही के वशीभूत होती हैं, जिसे ‘मनोवृत्तान्त’ का नाम दिया जा सकता है। चन्द्रकान्ता उसे छोड़ गई लेकिन उर्दू शायरी को एक सुन्दर विषय और उस विषय के साथ पूरा-पूरा न्याय करने वाला शायर ‘क़तील’ शिफ़ाई दे गई। अपने व्यक्तिगत ग़म और गुस्से के बावजूद जब ‘क़तील’ ने चन्द्रकान्ता को अपना काव्य-विषय बनाया—एक ऐसी नारी को जो अपना पवित्र नारीत्व खो चुकी थी और खो रही थी—तो न केवल उसने सामाजिक विवशताओं को स्थगित नहीं किया बल्कि एक सच्चे कलाकार की तरह यह खटक भी शामिल कर दी कि वह नारी इस भाव या अनुभव से वंचित नहीं कि जो कुछ वह कर रही है, अच्छा नहीं है। * अच्छा क्या है—मुहब्बत की नाकामी ने ‘क़तील’ को इस सर्वव्यापी प्रश्न पर सोचने की प्रेरणा दी। समय, अनुभव और साहित्य की प्रगतिशील धारा से सम्बन्धित होने के बाद जिस परिणाम पर वह पहुँचा, उसकी आज की शायरी उसी की प्रतीक है। उसकी आज की शायरी समय के साज़ पर एक सुरीला राग है—वह राग जिसमें प्रेम-पीड़ा, वंचना की कसक और क्रान्ति की पुकार, सभी कुछ विद्यमान है। उसकी आज की शायरी समाज, धर्म और राज्य के सुनहले कलशों पर मानवीय-बन्धुत्व के गायक का व्यंग्य है।

पंजाब के इस अलबेले गायक का जन्म 24 दिसम्बर, 1919 में तहसील हरीपुर ज़िला हज़ारा (पाकिस्तान) में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा इस्लामिया मिडिल स्कूल, रावलपिंडी, में प्राप्त की, उसके बाद गवर्नमेंट हाई स्कूल में दाखिल हुआ, लेकिन पिता के देहान्त और कोई अभिभावक न होने के कारण शिक्षा जारी न रह सकी और पिता की छोड़ी हुई पूँजी समाप्त होते ही उसे तरह-तरह के व्यापार और नौकरियाँ करनी पड़ीं। साहित्य की ओर ध्यान इस तरह हुआ कि क्लासिकल साहित्य में पिता की बहुत रुचि थी और ‘क़तील’ के कथनानुसार, “उन्होंने शुरू में मुझे कुछ पुस्तकें लाकर दीं जिनमें ‘क़िस्सा चहार दरवेश’, ‘क़िस्सा हातिमताई’ आदि भी थीं। मैं अक्सर उन्हें पढ़ता रहता था जिससे मुझे भी लिखने का शौक़ हुआ। अतएव प्रारम्भ में मैंने कहानियाँ लिखनी शुरू कीं, लेकिन कहानियों में कठिनाई यह थी कि मुझे उन्हें नक़ल करते समय बड़ा कष्ट होता था। मैंने कहानियाँ लिखनी छोड़ दीं और नज़्में लिखने की कोशिश की। सबसे पहले पाठशाला के दिनों में मैंने एक नाअ़त (मुहम्मद साहिब की छन्दोबद्ध प्रशंसा) लिखी जिस पर मुझे काफ़ी प्रोत्साहन मिला और मैंने बाक़ायदा नज़्में लिखनी शुरू कर दीं। उन्हीं दिनों पिता का देहान्त हो गया। फिर ताऊ चल बसे और एक वर्ष भी नहीं गुज़रा था कि फूफी भी उठ गईं। इन घटनाओं का मुझ पर गहरा असर हुआ और मैं बेहद भावुक हो गया। जब तक हरीपुर में रहा, परम्परागत क़िस्म की शायरी से जी बहलाता रहा लेकिन जब रावलपिंडी में आया तो साहित्य की नई धारा, जिसे प्रगतिशील धारा कहा जाता है, के अनुकरण में शैली के नए-नए प्रयोग किए। यहीं अहमद नदीम क़ासमी से मेरा पत्र-व्यवहार प्रारम्भ हुआ और कविता-सम्बन्धी उनके परामर्शों ने मेरी बड़ी सहायता की, और जब जनवरी 1947 में मैं लाहौर आया (प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘अदबे-लतीफ़’ के सम्पादक की हैसियत से) तो मैंने वास्तविक अर्थों में कुछ नई चीज़ें दीं और यों शायर के रूप में बाक़ायदा तौर पर मेरा परिचय हुआ।”

और फिर चन्द्रकान्ता के प्रेम और विछोह के बाद उस पर यह नया भेद खुला कि काव्य की परम्पराओं से पूरी जानकारी रखने, शैली में वृद्धि करने तथा नए विचार और नए शब्द देने के साथ-साथ केवल वही शायरी अधिक अपील कर सकती है जिसमें शायर का व्यक्तित्व या ‘मनोवृत्तान्त’ (जो अनिवार्य रूप से बाह्य परिस्थितियों से जन्म लेता और बनता है) विद्यमान हों।

इस प्रकार हम देखते हैं कि दूसरे महायुद्ध के बाद नई पीढ़ी के जो शायर बड़ी तेज़ी से उभरे और जिन्होंने उर्दू की ‘रोती-बिसूरती’ शायरी के सिर में अन्तिम कील ठोंकने, विश्व की प्रत्येक वस्तु को सामाजिक पृष्ठभूमि में देखने और उर्दू शायरी की नई डगर को अधिक-से-अधिक साफ़, सुन्दर, प्रकाशमान बनाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, उनमें ‘क़तील’ शिफ़ाई का विशेष स्थान है। बल्कि संगीतधर्मी छंदों के चुनाव, चुस्त सम्मिश्रण और गुनगुनाते शब्दों के प्रयोग के कारण उसे शायरों के दल में से तुरन्त पहचाना जा सकता है।

मर्हूम शायर ‘क़तील’ शिफ़ाई की कुल प्रकाशित कृतियों की संख्या 14 है, जिनके नाम इस प्रकार हैं : हरियाली, गजर, जलतरंग, रौज़न, झूमर, मुतरिबा, छतनार, गुफ़्तगू, पैराहन, आमोख़्ता, अबाबील, बरगद, घुंघरू तथा समंदर में सीढ़ी। उनकी चुनिंदा शायरी का यह संकलन इन्हीं की सहायता से बनाया गया है।

—प्रकाश पंडित

 

* इस विषय पर लिखी गई ‘शम्मअ-ए-अंजुमन’, ‘रास्ते का फूल’, ‘एल्बम’ आदि कुछ नज़्में इस संकलन में शामिल हैं। यहाँ भी ‘ऐक्ट्रेस’ नामक एक नज़्म के तेवर देखिए:

थरथराती रही चिराग की लौ अश्क पलकों पे काँप-काँप गए

कोई आँसू न बन सका तारा शब के साये नज़र को ढाँप गए

कट गया वक़्त मुस्कराहट में क़हक़हे रूह को पसन्द न थे

वो भी आँखें चुरा गए आख़िर दिल के दरवाज़े जिन पे बन्द न थे

सौंप जाता है मुझको तनहाई

जिस पे दिल एतबार करता है

बनती जाती हूँ नख्ले-सहराई 1

तूने चाहा तो मैंने मान लिया घर को बाज़ार कर दिया मैंने

बेचकर अपनी एक-एक उमंग तुझको ज़रदार 2 कर दिया मैंने

अपनी बेचारगी पे रो-रोकर दिल तुझे याद करता रहता है

कुमकुमों के 3 सियाह उजाले में जिस्म फ़र्याद करता रहता है

 

1. मरुस्थल का पेड़ 2. धनाढ्‌य 3. बिजली के हंडों के।

 

 

 

शा’यरी सच बोलती है

लाख पर्दों में रहूँ, भेद मेरे खोलती है
शा’यरी सच बोलती है
मैंने देखा है कि जब मेरी ज़बाँ डोलती है
शा’यरी सच बोलती है
तेरा इसरार 1 कि चाहत मिरी बेताब न हो
वाक़िफ़ 2 इस ग़म से मिरा हल्फ़-ए-अहबाब 3 न हो
तो मुझे वक़्त के सहराओं में क्यों दोलती है
शा’यरी सच बोलती है
ये भी क्या बात है, छुप-छुप के तुझे प्यार करूँ
गर कोई पूछ ही बैठे तो मैं इन्कार करूँ
जब किसी बात को दुनिया की नज़र तोलती है
शा’यरी सच बोलती है
मैंने इस फ़िक़्र में काटीं कई रातें, कई दिन
मेरे शे’रों में तिरा नाम न आए, लेकिन
जब तिरी साँस मिरी साँस में रस घोलती है
शा’यरी सच बोलती है
तेरे जलवों का है परतौ 4 मिरी एक एक ग़ज़ल
तू मिरे जिस्म का साया है तो कतरा के न चल
पर्दादारी तो खुद अपना ही भरम खोलती है
शा’यरी सच बोलती है

अग्नि को शाप (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ)

ब्रह्माजी ने भृगु ऋषि की रचना की, इसलिए ब्रह्माजी भृगु ऋषि को अपना पुत्र मानते थे।

भृगु ऋषि की एक सुंदर और पवित्र पत्नी थी, जिसका नाम पुलोमा था।

जब पुलोमा एक बालिका थी, तब पुलोमा के पिता ने पुलोमन नामक एक दानव से वादा किया था कि जब पुलोमा बड़ी हो जाएगी, तब उसकी शादी वह पुलोमन से कर देंगे । लेकिन पुलोमा के बड़े होने पर, उसके पिता ने उचित वैदिक संस्कारों के साथ उसका विवाह भृगु ऋषि से कर दिया। पुलोमन तब तक पुलोमा के प्यार में पड़ गया था और मन ही मन उसे अपनी पत्नी मानने लगा था।

बाद में, जब भृगु ऋषि के साथ पुलोमा का विवाह हो गया, तो उसका दिल क्रोध से जलने लगा। उसने ख़ुद से ठान लिया कि वह इस विश्वासघात का बदला ज़रूर लेगा। बदला लेने के लिए पुलोमन अवसरों की तलाश मे रहता और भृगु ऋषि की कुटिया को छुप-छुप के देखा करता।

एक दिन, जब भृगु ऋषि स्नान करने के लिए अपने कुटिया से बाहर चले गए, तब पुलोमन उनकी कुटिया को झाड़ियों से देख रहा था। अवसर देखकर, पुलोमन ने भृगु ऋषि की कुटिया में प्रवेश किया।

उस समय, पुलोमा भारी रूप से गर्भवती थी, लेकिन किसी मेहमान को कुटिया के द्वार पर देखकर, वह घरेलू जीवन के कर्तव्यों के अनुसार उसका स्वागत करने बाहर आ गई। द्वार पर किसी राक्षस को देखकर, वह चकित रह गई। पुलोमा ने पुलोमन को कभी नहीं देखा था, इसलिए वह उसे पहचान भी नहीं पाई।

इसके बावजूद, उसने कुटिया में पुलोमन का स्वागत किया और ‘अतिथि ही भगवान होता है’ इस शिक्षा के मुताबिक़, उसके भोजन के लिए कंदमूल और फल लाए।

जब पुलोमन ने उसे देखा, तब उसका मन वासना से भर गया और उसने भृगु ऋषि की अनुपस्थिति में पुलोमा का अपहरण करने का विचार किया।

ऐसा विचार करने के बाद, पुलोमन ने पुलोमा हाथ पकड़ लिया और उसे खींचकर ले जाने लगा। कमजोर पुलोमा ने उसका विरोध करने की पूरी कोशिश की, लेकिन वह शक्तिशाली पुलोमन को रोकने में असमर्थ रह गई।

पुलोमा को कुटिया से बाहर खींचते समय, पुलोमन को पास वाले कमरे में एक यज्ञ दिखाई दिया। उस यज्ञ में अग्नि भुभुक-भुभुक करके जल रहा था। अग्नि को देखकर पुलोमन वही रुक गया। एक हाथ से उसने पुलोमा को पकड़ रखा था। फिर, उसने अग्नि के देवता से पूछा, ‘हे अग्नि, कृपया करके मुझे बताओ कि यह किसकी पत्नी है? मेरी या भृगु की? उसके पिता ने मुझसे वादा किया था कि इसकी शादी मुझसे होगी, लेकिन बाद में, उन्होंने मेरे साथ धोखा कर दिया और इसकी शादी भृगु से कर दी।’

राक्षस की बातें सुनकर भी अग्नि ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह शांत ही बैठा रहा।

कुछ क्षण के बाद, पुलोमन ने फिर से अपना सवाल दोहराया, लेकिन अग्नि इस समय भी चुप ही बैठा रहा।

पुलोमन अग्नि से जवाब प्राप्त करना चाहता था, क्योंकि उसे लग रहा था कि अग्नि उसके पक्ष में बोलेगा। अग्नि कभी झूठ नहीं बोलता था। इस प्रकार, पुलोमन को विश्वास था कि पुलोमा पर उसके अधिकार को अग्नि से पुष्टि मिल जाएगी। अग्नि से पुष्टि मिलने के बाद, वह पुलोमा का अपहरण कर लेगा।

अग्नि को शांत देखकर, दानव थोड़ा ग़ुस्सा हो गया, लेकिन वह अपना सवाल दोहराता रहा। बार बार सवाल सुनकर, अग्नि अत्यंत व्यथित हो गया। अंत में, अग्नि ने भारी शब्दों में जवाब दिया, ‘पुलोमन, यह सच है कि पुलोमा के पिता ने उसकी शादी तुमसे कराने का वादा किया था, लेकिन बाद में, उन्होंने उचित वैदिक रीति-रिवाजों के साथ उसकी शादी भृगु ऋषि के साथ कर दी थी। इसलिए, वह तुम्हारी नहीं, भृगु ऋषि की पत्नी है। मैं तुम्हें सच बता रहा हूँ, क्योंकि दुनिया में झूठ का कभी सम्मान नहीं किया जाता।’

अग्नि से पुष्टि प्राप्त करने के बाद, राक्षस पुलोमा का अपहरण करने पर अधिक दृढ़ हो गया। तुरंत, उसने खुद को एक सूअर के रूप में बदल दिया और पुलोमा को उठाकर, उसने अत्यधिक गति के साथ भागना शुरू कर दिया।

लेकिन तभी, पुलोमा के पेट में पल रहा अजन्मा बच्चा इस हिंसा के कारण ग़ुस्सा हो गया और उसने अपनी माँ का गर्भ छोड़ने का फैसला कर लिया। उसने अपनी माँ के पेट से जमीन की ओर छलाँग लगायी। छलाँग लगाने के बाद, जब वह आकाश में था, तब उसके तपस्वी गुणों के कारण पूरा आकाश प्रकाशित हो गया।

जब दानव ने आकाश में चमक देखी, तब उसने भागना बंद कर दिया और पुलोमा को अपने जकड़न से कुछ पल के लिए छोड़ दिया। जैसे ही पुलोमा रिहा हो गई, उसके बच्चे ने अपने गुस्से से आग की लपटें पैदा की। फिर उस धधकती हुई आग ने एक ही क्षण में दानव को जलाकर राख कर दिया।

बच्चा जन्म के समय से पहले ही अपने माँ के पेट से गिरा था, इसलिए उसे ‘च्यवन’ नाम दिया गया। ‘च्यवन’ ये शब्द ‘च्युता’ नाम के एक संस्कृत शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है – समय से पहले पैदा होने वाला बच्चा। आगे चलकर, च्यवन एक महान ऋषि बन गए। बाद में, च्यवन ऋषि ने ‘च्यवनप्राश’ नामक प्रसिद्ध पोषक मिश्रण का आविष्कार किया।

इस घटना के कारण, पुलोमा बेहद दु:खी हो गई थी। उसने च्यवन को उठाया और आँसुओं से भरी आँखों के साथ वह अपने आश्रम की ओर चलने लगी। उसकी आँखों से आँसू टप-टप करके जमीन पर गिर रहे थे।

ब्रह्माजी अपने लोक से अपने पुत्रवधू की स्थिति देख रहे थे। उसे सांत्वना देने के लिए वह उसके सामने प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने देखा कि पुलोमा के आँसू एक बड़ी नदी के रूप में बदल रहे थे और वह नदी पुलोमा के मार्ग का अनुसरण कर रही थी। ये देखकर ब्रह्माजी ने उस नदी का नाम ‘वधुसरा’ रख दिया। फिर ब्रह्माजी ने पुलोमा से बात करके, उसका दुख दूर किया और वह अपने लोक लौट गए।

जब पुलोमा आश्रम पहुँची, तब उसने देखा कि भृगु ऋषि अत्यंत क्रोधित अवस्था में है।

भृगु ऋषि ने पुलोमा से गुस्से से पूछा, ‘तुम्हारे अतीत के बारे में दानव को किसने बताया जिससे उसने तुम्हारा अपहरण कर लिया?’

पुलोमा ने अपने पति को खुलासा किया कि उसके भूतकाल के बारे में अग्नि ने राक्षस को बताया था।

पुलोमा की बातें सुनकर भृगु ऋषि अग्नि पर अत्यंत क्रोधित हो गए और गुस्से में उन्होंने अग्नि को शाप दिया, ‘हे अग्नि, तुमने मेरी पत्नी का अपहरण करने में उस राक्षस की मदद की है, इसलिए में तुम्हें शाप देता हूँ। इस क्षण से, तुम शुद्ध और अशुद्ध ऐसे सारे पदार्थ ग्रहण करोगे।’

अग्नि यह शाप सुनकर चकित हो गया। उसे लग रहा था कि उसने कोई ग़लत काम नहीं किया हुआ। अग्नि ने शाप के विरोध में भृगु ऋषि से कहा, ‘हे ऋषिवर, मुझे शाप देना योग्य नहीं है, क्योंकि मैंने सच बोला है। जो झूठ बोलता है, वह अपनी सात पीढ़ियों को नरक में ले जाता हे। जो सब कुछ जानकार भी सच्चाई नहीं बोलता, वह पाप का भागीदार बन जाता है। मैं देवताओं और पूर्वजों का मुख हूँ और वह मेरे द्वारा ही अन्न ग्रहण करते हैं। इसलिए, में कभी झूठ नहीं बोलता। आप थोड़ा सोचिए कि में हमेशा उन जगहों पर मौजूद रहता हूँ, जो पवित्र होती हैं। तो मैं उन चीजों को कैसे खा सकता हूँ, जो अशुद्ध और गंदी हो?’

लेकिन भृगु ऋषि अग्नि को शाप देने पर अड़े रहे।

भृगु ऋषि के ऐसे बर्ताव से अग्नि दुखी हो गया। अग्नि ने फिर दुनिया के सभी यज्ञोंसे खुद को हटा दिया और भृगु ऋषि के शाप पर अपनी नाराज़गी जतायी। अग्नि के बिना, यज्ञों का होना नामुमकिन हो गया। जिसके कारण देवता असंतुष्ट रहने लगे और पूर्वज भूखे रहने लगे। इस चीज़ ने ऋषियों को चिंतित कर दिया। उन्होंने देवताओं से संपर्क किया और उन्हें अग्नि के ना होने के कारण यज्ञ करने की असमर्थता के बारे में बताया।

देवताओं ने ऋषियों के साथ मिलकर इस समस्या पर समाधान सोचने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कुछ उपाय नहीं सूझा। फिर देवता और ऋषि-मुनि सब मिलके ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी को उन्होंने अग्नि के यज्ञों से हटने के बारे में बताया। ब्रह्माजी ने उन सब लोगों को शांत किया और सबको बताया की वह इस बारे में अग्नि से बात करेंगे।

सब लोग जाने के बाद, ब्रह्माजी ने अग्नि को बुलाया और उससे कहा, ‘हे अग्नि, तुम सब कुछ बनाने वाले और नष्ट करने वाले हो। भृगु ऋषि के शाप को सत्य होने दो। मैं घोषणा करता हूँ कि तुम्हारे हर एक रूप को अशुद्ध चीजें खाने की जरूरत नहीं होगी। केवल तुम्हारा कोई-कोई रूप ही अशुद्ध और गंदी चीजें खाएगा। उदाहरण के लिए, तुम्हारा जो रूप मांसाहारी जानवरों के पेट में रहता है, वह अशुद्ध चीजें खाएगा। लेकिन तुम उसकी चिंता मत करो। में वरदान देता हूँ कि तुम्हारे द्वारा छुआ गया सब कुछ अंततः शुद्ध हो जाएगा। कृपया यज्ञ की आग पर वापस चलो जाओ। देवताओं और पूर्वजों के लिए भोजन ग्रहण करो।’

अग्नि ने भगवान ब्रह्मा की आज्ञा का पालन किया और वह दुनिया के सभी यज्ञों में फिर से लौट गया।

अग्नि यज्ञ में लौटते ही, दुनिया के सारे ऋषि-मुनियों में ख़ुशी की लहर फैल गई और उन्होंने फिर से अपने अनुष्ठानों की शुरुआत की।