बीकानेर राजस्थान में मूषकों का अनोखा साम्राज्य : करणी माता मंदिर (भारत के अनोखे मंदिर-1)

शीर्षक पढ़ कर ही आपकी भौंहें सिकुड़ गयी होंगी और सारे शरीर में सिहरन दौड़ गयी होगी। जी हाँ मूषक, जिनका उल्लेख करते ही हम चौंक जाते हैं और उन्हें भगाने में जुट जाते हैं, उन्ही मूषकों को एक संपूर्ण मंदिर समर्पित है। करणी माता मंदिर एक ऐसा मंदिर है जहाँ २०,००० से अधिक श्याम व श्वेत मूषकों का वास है। आप इस मंदिर के दर्शन के समय इन मूषकों से भेंट कर सकते हैं, इन्हें खिला पिला सकते हैं और चाहें तो इनके चित्र भी खींच सकते हैं। लगभग २०,००० काले मूषक करणी माता मंदिर में निरंतर घूमते रहते हैं। गर्भगृह में माता की प्रतिमा के चारों ओर दौड़ते कूदते फांदते रहते हैं। भक्तों द्वारा चढ़ाए गए प्रसाद खाते व दूध पीते इन निर्भीक मूषकों को मनुष्यों की उपस्थिति का तनिक भी आभास नहीं रहता। यहाँ तक कि, मंदिर के गलियारे में जब मानसिंगजी भजन गाते करणी माता की गाथा भक्तों को सुना रहे थे, बिना हिचक ये मूषक उनके चारों ओर फुदकते भजनों का आनंद ले रहे थे।
  

देशणोक स्थित करणी माता मंदिर की गाथा

करणी माता पौराणिक कथाओं की देवी नहीं अपितु १४-१५ वी. शताब्दी की एक आदरणीय कुलीन स्त्री थी। करणी माता का जन्म चारण गोत्र में अनुमानतः २ अक्टूबर १३८७ में हुआ था। साठिका ग्राम के देपोजी चारण से विवाहोपरांत उन्होंने वैवाहिक धर्म अस्वीकार किया। देपोजी चारण का विवाह अपनी अनुजा भगिनी से कर स्वयं तपस्विनी का जीवन व्यतीत किया। किसी समय, उनके सौतेले पुत्र लक्ष्मण की, कोलायत तहसील में स्थित कपिल सरोवर से जल पीते समय, डूबकर मृत्यु हो गयी थी। करणी देवी ने मृत्यु देवता यम का आव्हान किया और उनसे लक्ष्मण को लेकर ना जाने की याचना की। अंततः यम ने हार मान कर लक्ष्मण को मूषक के रूप में पुनर्जीवित किया। लक्ष्मण के अलावा, अन्य पुत्रों को भी मूषकों के रूप में पुनर्जीवन का वरदान दिया। इसी कारण स्थानीय लोगों की मान्यता है कि चारण गोत्र के हर मृत्यु-प्राप्त व्यक्ति को मूषक के रूप में पुनर्जन्म प्राप्त है। इसके ठीक विपरीत, मूषक मरणोपरांत मनुष्य रूप में पुनर्जीवित होते हैं। अर्थात् मंदिर में मूषक एवं चारण गोत्र में मनुष्यों की संख्या अचल है। अत्यंत रोचक मान्यता है!
“ करणी माता, बीकानेर एवं जोधपुर के राज परिवारों की आराध्य देवी है।”

मूषक नहीं काबा

करणी माता के इन नन्हे भक्तों को यदि कोई मूषक कहे तो यह इस मंदिर के पुजारियों व कर्मचारियों को रास नहीं आता। वे इन्हें प्रेम से काबा कहते हैं क्योंकि वे इन्हें करणी माता की संतान मानते हैं। हालांकि मुझे यह जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी कि वे इन मूषकों को काबा क्यों कहते हैं। कहा जाता है कि सर्वाधिक बड़ी महामारी प्लेग के समय भी इन मूषकों पर किसी विपरीत परिणाम के संकेत नहीं पाए गए। मैंने देखा कि इन मूषकों को मंदिर के अन्दर बाहर आने जाने की पूर्ण आजादी थी। परन्तु मुझे बताया गया कि ये मूषक मंदिर छोड़ कर कभी नहीं जाते। महिमा को नकारने वालों का वितर्क है कि खाने हेतु प्रसाद व पीने हेतु दूध की प्रचुर मात्रा के रहते ये मूषक अनावश्यक क्यों बाहर जाएँगे। मैंने १ की.मी. के अंतराल पर स्थित दोनों करणी माता मंदिरों के दर्शन किये। दोनों मंदिरों में मैंने मूषकों को परिसर के भीतर ही आवाजाही करते देखा।

करणी माता के श्वेत मूषकों की गाथा

करणी माता मंदिर में वास करते मूषकों में कुछ श्वेत मूषकों का भी समावेश दिखाई पड़ता है। इन श्वेत मूषकों को पवित्र आत्मा कहा जाता है क्योंकि भक्तगण इन्हें साक्षात करणी माता व उनकी संतानों का अवतार मानते हैं। श्वेत मूषकों के दर्शन क्वचित ही प्राप्त होते हैं। जिन्हें उनके दर्शन प्राप्त हो गए, उन्हें माता का आशीर्वाद प्राप्त हो गया, ऐसी मान्यता है। यदि आपको मूषकों का झुंड दिखाई पड़े, तो संभवतः वह किसी श्वेत मूषक को घेरे श्याम मूषकों का झुंड हो सकता है। अतः, यदि आप श्वेत मूषक के दर्शनों के अभिलाषी हैं तो मूषकों के झुंड को खोजने का प्रयास करें। सौभाग्य से मुझे श्वेत मूषक के दर्शन प्राप्त हुए। मेरा सदैव यह विश्वास रहा है कि मुझ पर भगवान् की असीम कृपा है। उस दिन श्वेत मूषक के दर्शन ने मेरा विश्वास अधिक दृढ कर दिया। श्वेत मूषक के दर्शन से एक कदम आगे, एक और मान्यता है। किसी मूषक का आपके चरणों को लांघना शुभ संकेत माना जाता है। मूषक का आपके चरणों को लांघना, श्वेत मूषकों के दर्शनों से आसान एवं संभव है, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में मूषक यहाँ से वहां दौड़ते रहते हैं। व्यक्तिगत रूप से मुझे मूषकों से बहुत भय लगता है। अतः उनसे बचने के लिए उनसे अधिक मैं उछल रही थी और अन्य भक्तगणों की खीज का कारण बन रही थी। मैंने इन मूषकों के साथ प्रसाद भक्षण करते कुछ लाल चोंच के तोतों को भी देखा।


करणी माता मंदिर- क्या करें, क्या ना करें


• अन्य किसी भी मंदिर की तरह, करणी माता मंदिर में भी नंगे पाँव जाना पड़ता है। पांवों में मोजे डालना भी मना है।
• मंदिर के भीतर पाँव उठाकर नहीं, अपितु घसीटकर चलने की आवश्यकता है ताकि भूल से भी किसी मूषक को चोट ना पहुंचे।
• यदि भूल से भी आपके द्वारा किसी मूषक की मृत्यु हो जाय, तो पश्चाताप हेतु आपको स्वर्ण अथवा चाँदी का मूषक मंदिर में दान देना पड़ता है।
• मंदिर की भित्तियाँ, धरती व कोनों में मूषकों की आवाजाही हेतु छिद्र बने हुए हैं। इन छिद्रों के समीप अत्यंत सावधानी पालें।
• मूषकों को प्रसाद भक्षण कराने हेतु निर्धारित स्थलों पर ही जाएँ।

करणी माता मंदिर का वास्तुशिल्प


देशणोक स्थित करणी माता मंदिर की संरचना दुर्ग सदृश की गयी है। मंदिर के चारों कोनों में दुर्ग स्थापित हैं। मुख्य प्रवेश द्वार अत्यंत नक्काशीयुक्त संगमरमर का बना हुआ है। करणी माता मंदिर संग्रहालय के भीतर लगे सूचना पट्टिका के अनुसार यह मंदिर मूलतः एक गुफा के भीतर स्थापित किया गया था, जहां करणी माता ने तपस्या की थी। महाराजा सूरत सिंह ने सर्वप्रथम इस गुफा के चारों ओर मंदिर की संरचना करवाई थी। संगमरमर में बने वर्तमान मंदिर की स्थापना राव बीका वंश के सर्वश्रेष्ठ महाराजा गंगा सिंह जी ने की थी। समयानुसार इस पर यूरोपीय शिल्पकला का भी किंचित प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। शिल्पकला चाहे प्राचीन हो अथवा यूरोपीय सम्मिश्रित, मूषकों का शिल्प इनका एक अभिन्न अंग है। फलकों की किनारपट्टी पर मूषकों के शिल्प का प्रयोग अत्यंत अनोखा है। अन्य स्थानों पर मूषकों के साथ अन्य पशु पक्षियों की शिल्पकारी भी सुंदरता से की गयी है। संगमरमर पर की गयी पुष्पों, पत्तों व बेलों की नक्काशी अत्यंत मनभावन है। मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर श्वेत संगमरमर से बने दो झरोखे हैं जिन पर चाँदी के पत्रों के द्वारपट लगाए गए हैं। इन चाँदी के द्वारपटों पर मूषक व त्रिशूल की नक्काशी की गयी है। प्रवेश द्वार के दोनों ओर धरती पर दुर्गा माँ के वाहन, सिंह की प्रतिमाएं खड़ी हैं। प्रवेश द्वार पर देवी लक्ष्मी एवं सरस्वती के साथ करणी माता के विभिन्न अवतारों की शिल्पकारी है। द्वार के एक पट पर भगवान् शिव का भी चित्र उत्कीर्णित है। वर्तमान मंदिर के पीछे एक बहुत बड़े मंदिर की संरचना का कार्य चालू स्थिति में है। करणी माता मंदिर के समक्ष एक छोटा एकल-कक्ष संग्रहालय है जहां चित्र श्रंखला द्वारा करणी माता की गाथा कही गयी है। चित्र श्रंखला का आरंभिक चित्र है करणी माता से गर्भवती उनकी माता श्री का, जो अपने गर्भ में दुर्गा माँ के अवतरित होने का स्वप्न देख रही है। अगले चित्र में नन्ही करणी को अपने पिता को सर्पदंश से बचाते दर्शाया गया है।

करणी माता की अलौकिक शक्तियां


संग्रहालय के चित्रों से यह प्रतीत होता है कि करणी माता अलौकिक शक्तियों की धनी थी। एक चित्र में उनके विवाहोपरांत ससुराल गमन का दृश्य चित्रित किया गया है जहां करणी माता अपने पति को अपनी अलौकिक शक्ति की एक झलक दिखाती है। चित्र के अनुसार करणी माता ने कई घड़े जल को उलट दिया व वही जल पति को रेगिस्तान में दिखाया। चित्र में माता अपनी पालखी की मसहरी हटा कर पति को अपने दुर्गा अवतार के दर्शन करा रही हैं, मानो वे अपने पति को भविष्य की एक झलक दिखा रही है। कहा जाता है कि ससुराल पहुंचते ही उन्होंने वहां की स्त्रियों को स्तब्ध कर दिया था जब उन्होंने अपने स्थान से बिना हिले, पात्र से उफनते दूध को गिरने से रोक दिया था। तत्पश्चात अपने अलौकिक शक्तियों का उपयोग कर लोगों के उद्धार की कई घटनाएँ यहाँ चर्चित हैं, जैसे घोड़ों का उपयोग कर मवेशियों हेतु जल खींचना, आक्रमणों से मवेशियों का रक्षण, गृह के भीतर बैठकर दूध मथते हुए मुखिये के जहाज का तूफ़ान से बचाव, कुएँ में गिरे अथवा सर्पदंश के शिकार लोगों के प्राण बचाना इत्यादि। उन्होंने बीकानेर के संस्थापक राव बीका के विवाह में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। अपने सद्भावपूर्ण अलौकिक शक्तियों का उपयोग उन्होंने कई युद्ध में उत्प्रेरक के रूप में किया था। संग्रहालय के इन चित्रों की एक विशेषता यह थी कि प्रत्येक चित्र की किनारपट्टी मूषकों की श्रंखला द्वारा चित्रित थी। संग्रहालय में प्रत्येक घटनाक्रम का तिथिनुसार अंकन किया गया है। दृश्य चित्रण के अतिरिक्त संग्रहालय में करणी माता के कई छायाचित्र भी रखे हुए हैं। अधिकतर चित्रों में उनके दुर्गा माँ का अवतार दर्शाया गया है। एक विशेष चित्र पर मेरी दृष्टी ठहरी जिसमें करणी माता को श्वेत दाढ़ी व मूंछ के साथ वृद्ध स्त्री के रूप में दिखाया गया है। मैंने अनुमान लगाया कि संभवतः उन्हें स्त्री अधिनायिका दर्शाने हेतु किया गया प्रयास हो। मेरे परिदर्शक के अनुसार करणी माता १३० वर्षों तक जीवित थी एवं वृद्धावस्था में उनका यही रूप था।

करणी माता का दूसरा मंदिर


करणी माता के गुलाबी मंदिर से लगभग १ की.मी. की दूरी पर उन्हें समर्पित एक और मंदिर स्थापित है। यह वही स्थान है जहां उपरोक्त कथानुसार माता ने दूध मथते हुए मुखिये के जहाज की रक्षा की थी। मूलतः यहाँ माता की केवल एक प्रतिमा थी जिस पर एक विशाल वृक्ष की छत्रछाया है। मंदिर के पुजारी के अनुसार माता ने ही इस वृक्ष का रोपण किया था। मंदिर एक विशाल चाँदी के छत्र व अपेक्षाकृत नवीन संगमरमरी अग्रभाग से सज्ज है। मेरे दर्शन के समय, मंदिर में कुछ स्थानीय भक्त ही उपस्थित थे। मंदिर की ओर जाते समय मैंने इस क्षेत्र में बहुतायत में पाए जाने वाले पशु, ऊँट व भेड़ों को चरते देखा। मुझे बताया गया कि मंदिर की परिक्रमा हेतु बनाया गया ५ – ६ की.मी. लम्बा परिक्रमा पथ इस क्षेत्र को घेरता है। आबादी की अनुपस्थिति में यह स्थान पशुओं द्वारा चरने हेतु उपयोग में लाया जाता है। मैंने मन ही मन निश्चय किया कि बीकानेर की मेरी अगली यात्रा में मैं यह परिक्रमा पूर्ण करने का अवश्य प्रयत्न करुँगी।

देशणोक के मूषक मंदिर की यात्रा हेतु सुझाव


• देशणोक बीकानेर से लगभग ३०कि.मी. की दूरी पर स्थित है।
• सार्वजनिक परिवहन के साधन बहुतायत में उपलब्ध हैं। इसके अलावा आप किराए की मोटरगाड़ी भी ले सकते हैं।
• करणी माता संग्रहालय के दर्शन हेतु परिदर्शक की आवश्यकता नहीं है।
• करणी माता मंदिर के पट प्रातः ४ बजे मंगल आरती के साथ खुलते हैं।
• इस मंदिर में दोनों नवरात्रि के समय, अर्थात्  मार्च-अप्रैल एवं सितम्बर-अक्टूबर, मेला भरता है। उस समय यहाँ भक्तों की बड़ी भीड़ रहती है। मंदिर दर्शन हेतु औसतन ५-६ घंटों का इंतज़ार करना पड़ सकता है।
अंततः मूषकों के स्वर्ग, करणी माता मंदिर के दर्शन संपन्न हुए। मेरे मस्तिष्क में एक विनोदी विचार उत्पन्न हुआ। मूषकों के विषय में यह अवश्य कहा जाता होगा कि अच्छे कर्म करने वाले मूषक को स्वर्ग अर्थात् करणी माता मंदिर में स्थान प्राप्त होता है!

Leave a Comment